सोमवार, 26 अक्टूबर 2020

लघुकथा : बन्डु

बन्डु 


बन्डु बहुत ही चालाक व्यक्ति था। जिससे भी वह मिलता झटपट ही उसके अंदर की बात जान लेता था। 

 इसका वह लाभ भी आये दिन उठा लिया करता था। किसी की हिम्मत न होती, उससे कुछ छिपाने की। 


किसी समय  कुछ लोगों ने मिलकर उसका प्रतिरूप बनाया। प्रतिरूप हु-ब-हू उसके जैसा ही दिखाई दे रहा था। लोग अपना गुस्सा उतारने के लिए उस पर लात  मारने लगे। 


भीड़ में किसी ने कहा "इसे जला दो।" 


कोई माचिस और केरोसिन ले आया। 

एक ने आगे बढ़कर आग लगा दी। धुंए से उसका चेहरा काला हो गया था। 


आग की ज्वाला में उसका चेहरा दमकता हुआ अट्टाहास करता दिखाई दे रहा था। 


आग को देखकर और लोग आये। वे लोग "बन्डु" को पहचानते थे। उन्होंने  'आव देखा न ताव'  आग बुझा दी। उसका चेहरा जलने से बच गया। 


वह मात्र "बन्डु" का प्रतिरूप ही था। 


उदय श्री ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश भारत