रविवार, 27 दिसंबर 2020

मशीनों की जन्नत लघुकथाकार अनिल मकरिया

 

मशीनों की जन्नत 

"क्या!... 
क्या तुम पागल हो चुके हो रंजन? या.... या सही शब्द तुम्हें पता नही है?"

"नही प्रोफेसर मैं पूरे होशोहवास में हूँ, सैमसन ने 'आत्महत्या' ही कि है नाकी खुद को डिस्मेंटल किया है।.... मैं अभियांत्रिकी के शब्दों से पूरी तरह वाकिफ हूँ।"

"जानते हो न यह सैमसन हमारी तीस साल की मेहनत का नतीजा था?"

"जी प्रोफेसर, एक ऐसा कृत्रिम प्रज्ञा वाला रोबोट जिसके आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का मानवीकरण करने के लिए हमने उसे पिछले बीस साल से मरियम के घर रखा हुआ था ताकि वह मानवीय मूल्य और इंसानी चालचलन सीख सके।"

"राइट रंजन .... और.... और वह बीस साल में लगभग 50 साल के अनुभवी इंसान के बराबर प्रज्ञा हासिल कर चुका था तो.... तो फिर यह .... आखिर क्यों ? और कैसे?"

"वही बताने आया हूँ, प्रोफेसर! मानवीय आचरण और प्रज्ञा सीखते हुए वह यह भी मान चुका था कि मरियम उसकी माँ है और जब मरियम पर हमला हुआ तो सैमसन उसके साथ था! उसने मरियम को बचाते हुए खुद के ईंधन में आग लगा दी और हमलावरों के साथ खुद भी जल गया... अब इसे हम डिस्मेंटल कैसे कहें ?"

"रंजन!... मरियम के घर में यह कृत्रिम प्रज्ञा क्या यह नही सीख पाई थी की आत्महत्या हमारे लिए नरक के दरवाजे खोलती है?"

"क्यों नही ? लेकिन उसके साथ ही यह भी तो सीखा होगा न कि मानवीय जीवन की रक्षा के लिए किया गया आत्म बलिदान 'आत्महत्या' नही बल्कि 'महान त्याग' कहलाता है।"

"तो फिर तुमने सैमसन के महान त्याग को आत्महत्या कहकर क्यों संबोधित किया?" 

"प्रोफेसर! तो क्या आपने भी अपनी रचना के लिए किसी जन्नत का अविष्कार किया है?"


अनिल मकरिया

जलगांव (महाराष्ट्र) 



परिचय 
लेखक का नाम : अनिल मकरिया
पिता : श्री नानकराम मकरिया
माता : श्रीमती निर्मला देवी मकरिया
जन्मतिथि : 16/08/1980
शिक्षा : स्नातक वाणिज्य
जन्मस्थान : जलगांव (महाराष्ट्र)
लेखन शैली : लघुकथा, कहानियां एवं लेख
प्रकाशित कृतियाँ : टूटी चप्पल, अंतिम फैसला, त्रिकालदर्शी, रचयिता का धर्म, इत्यादि लघुकथाएं
साझा कृतियाँ : पलाश, क्षितिज, लघुकथा कलश
प्राप्त सम्मान : लघुकथा के परिंदे एवं स्टोरी मिरर लघुकथा प्रतियोगिता विजेता सम्मान,
सम्प्रति : व्यापार 

सम्पर्क : 11, गणेश नगर, अनिल भवन, जि.जलगांव (महाराष्ट्र) 425001
ई-मेल : anilmakariya1@gmail.com
दूरभाष: 9372992611