शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

नमिता सचान सुंदर की दो लघुकथाएँ

लघुकथा 

माटी का रस

         “यह क्या जंगल उगा रखा है तुमने आंगन में?”

      “जंगल?”

      “हां और नहीं तो क्या, एक एक गमले में चार -चार, छः -छः पौधे वे भी सब अलग -अलग किस्म के। कहीं जंगली घास, कहीं अपने आप उग आयीं बेल।"

    “पर कितना हरा-भरा है मेरा यह छोटा सा कोना।"

     “अरे! हरियाली इतनी पसंद है तो कायदे से दो- चार गमलों में एक- एक पौधा लगा कर शौक पूरा कर लो। पर यह बेतरतीब जंगल!" 

     “जंगल कभी बेतरतीब नहीं होते। बहुत व्यवस्थित होता है जंगल का अनुशासन। घास के तिनके से ले कर सैकड़ों फीट ऊंचे पेड़ों तक सबके पनपने के लिए जगह होती है।" 

      “तुम्हारी ये बेसिर- पैर की बातें... मुझे तो कुछ समझ नहीं आती।" 

     “आ भी नहीं सकती, हरियाली पोसने के लिए नमी बहुत जरूरी होती है।” एक बेधती नजर उसके भीतर उतरती चली गई। जहां करीने से सजी फाइलों और नोटों की गड्डियों के बीच तिनका भर दूब की भी जगह न थी। 

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लघुकथा 

धुंआ

      “मृतका का नाम बताइए...” मंत्रोच्चारण के बीच पंडित जी की आवाज गूंजी। भरे-पूरे आंगन को जैसे सांप सूंघ गया। सबकी नजरें मृतका की सांस यानि उस बड़े कुनबे की मलकिन की ओर उठीं। जिन्होंने पंडित जी की बात सुनते ही पूरी शिद्दत से होंठों को दांतों से दबा एकटक हवन कुंड की अग्नि पर अपनी दृष्टि स्थिर कर दी थी। मृतका के पति दायें बायें देखते सबसे नजर चुरा रहे थे।

        कोई कुछ कहे उससे पहले ही ससुराल से अभी-अभी पहुँची  मृतका की बेटी की बेबसी और आक्रोश से लबरेज चीख सरीखी आवाज गूंजी। “नाम? नाम तो अपना उन्हें खुद भी याद नहीं रह गया था। आप तो पंडित जी  जो कुछ भी कहना है न, बिना नाम लिए ही कह दीजिए। वे समझ जायेंगी कि उन्हीं के लिए है, उन्हीं से कहा जा रहा है।

   “मगर बिटिया...” अचकचाए से पंडित जी ने बोलने की कोशिश की। 

    "अगर- मगर कुछ नही पंडित जी! 

      जीते जी जो नाम तो दूर, सम्बोधन  तक को तरस गई इस घर में, उसका अब नाम क्या?  बिना नाम लिए आदेश पर आदेश उछाले जाते रहते थे और वह लपक लेती थी।" उसकी नजर से तो लपटें निकल रहीं थीं पर उसकी आवाज में वह कातरता छलक ही आई जिसे दबाने का वह भरसक प्रयास कर रही थी और फिर फूट ही पड़ी कलेजा चीरती रुलाई। एक बार जोर से भभकी हवन कुंड की ज्वाला और फिर दूर ऊपर आकाश की ओर उठता चला गया धुआं। 


नमिता सचान सुंदर 




5/138, विकास नगर

लखनऊ -226022 

मो-- 7985281674