सोमवार, 16 नवंबर 2020

फूल लाल अशोक के लघुकथाकार नमिता सचान सुंदर



 

लघुकथा 


फूल लाल अशोक के



“सुनो मैं बाहर जा रही हूं."  

अपनी चटक साड़ी का आंचल लहराते बोली वह. 


“हूं....” 

उसने मेज पर फैली मोटी-सी रसायन शास्त्र की किताब और रिसर्च पेपर्स में झुके सिर को बिना उठाए ही हुंकारी भरी.  

अपने लम्बे खुले बालों की एक लट से सायास खेलते उसने फिर कोशिश की.

 “पूछोगे नहीं कहां? क्यों?”

‘’आं...” 

     इस बार उसने एक उड़ती नजर फेंकी उसकी तरफ. 

 “अरे किसी काम से ही जा रही होगी या सहेलियों के पास." 

“हां, काम तो है...” 

 इस बार उसकी आवाज में थोड़ी थकान झलक आई. उधर से कोई जवाब न आने पर झटके से थोड़े तेज सुर में बोली वह.  

“जा रही हूं, लाल फूल वाले अशोक का पौधा लाने." 

इस बार असमंजस भरी आंखे उठी.  

“लाल फूल वाला अशोक! क्यों भला?”

“कामदेव के बाण में था. प्रेम जगाता है." 

“बाहर धूप बहुत तेज है, छाता और चश्मा ले लिया है न?” 

"हुं ह..."  

आंचल को कस कर अपने चारो ओर लपेटा उसने और पैर पटकती चल दी बाहर को. 

“अरे सुनो, जा ही रही हो तो प्रेम समझाने वाला कोई पौधा मिले तो वह भी लेती आना.” 

पीछे से आयी आवाज में हल्की सी चुहल की खनक उस तक पहुंच ही गई. 

असमंजस में भर ठिठकी वह, फिर धीरे से पीछे मुड़ कर देखा, गझिन पातों को सरका विहंस रहे थे, फूल लाल अशोक के.  






नमिता सचान सुंदर 

5 138, विकास नगर

लखनऊ—226022

मो.-- 7985281674