संग्रह सरल व्यक्तित्व के स्वामित्व लिए पवन शर्मा की आंचलिक शब्दों से बुनी हुई लघुकथाओं का गुलदस्ताॅ है। लघुकथाएँ पहली बार, यह पारी ही तो है! टूटने पर, लाचारी, लँगड़ा, बुुुजदील, षड़यंत्र, बड़े बाबू और साहब, इस भीड़ में, दुःख दिखे तो कैसे! बाप बेटे और माँ, तुम तो कहते थे! जीवन है ये!
सुरेंद्र के पिता को लेकर चार मार्मिक लघुकथाएँ लिखी गई है।
मेरी चुनिंदा लघुकथाएँ : पवन शर्मा







