लघुकथा
फिर सुबह होगी
अनिता की बीमारी का उपचार मनोचिकित्सक साहब भी न समझ पा रहे थे।
अवसाद ग्रस्त एक एक दिन व्यतीत करना अब अत्यंत मुश्किल हुआ जा रहा था।
घड़ी की सुईयां मिलकर रात्रि के बारह बजा रही थी।
"मैं सब कुछ जान गया हूँ। जो नहीं जान पाया हूँ, वह जानना भी नहीं चाहता हूँ।"
अनिल की आवाज भर्रा रही थी।
"हमारा गठबंधन है, वादो से। तुम कह दो तो फिर नयी सुबह होगी।"
अनिता टुट चुकी थी। वह अनिल के सामने झुक कर कांपते हुए बोली "मुझे अफसोस है, मैं आप को समझ न पायी, मैं भटक गई थी। मुझे माफ कीजिए।"
अंधकार से निकल कर। ज़िन्दगी बहार है। अवसाद के बादल छंटने लगे थे। पूरब में आसमान लाल हो रहा था।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
