*हे! लघुकथा! क्या - क्या जतन करते हैं, तुम्हें लिखने के लिए। तुम्हें क्या पता, ये दिल बेकरार कितना ....
मेरी रचना प्रक्रिया बहुत ही सरल है! ज्ञान हमारे मस्तिष्क में संचित रहता ही है! मन मस्तिष्क में सैकड़ों विचार आते ही रहते हैं! अच्छे - बुरे, आशा -निराशाजनक इन सब से ही जन्म होता है, "कथानक" का, दिमाग में कथानक आता है! अधिकतर उस पर थोड़ा विचार करता हूं! फिर दूसरे कार्य में लग जाता हूं! भूल जाता हूं! यदि एक -एक कथानक पर कथा लिखता रहता तो आज महाग्रंथ बन जाता किंतु कोई -कोई कथानक दिमाग को बार-बार संदेश देते हैं कि इस पर अच्छी रचना हो सकती है!
जब एक ही कथानक पर बार-बार संदेश आने लगता है कि इस पर अच्छी रचना तैयार होगी। तब कागज कलम लेकर बैठ जाता हूं। श्री सरस्वती देवी की महिमा से कलम कागज पर चलती जाती है और एक रचना तैयार हो जाती है । मैं तो निमित्त मात्र हूं!
आपका अपना ही
उदय श्री. ताम्हणे
उदय श्री. ताम्हणे
