संस्मरण
एक रुपया
मां कहती थी, भगवान को चढ़ाने के लिए मुझे प्रतिदिन पांच रुपए के फूल ला दिया करो ।
तब मैं बोल पड़ता था कि यह तो फिजूलखर्ची है।
भगवान को पेड़ से ही फूल तोड़कर चढ़ा दिया करो, वे खुशबू ले लेंगे प्रसन्न हो जाएंगे!
अब सोचता हूं, एक रुपया ही सही प्रतिदिन मालन के झोली में जाता तो है।
उदय श्री़. ताम्हणे
भोपाल
