अश्विनी कुमार आलोक
प्रभा निकेतन,
पत्रकार काॅलोनी,
महनार वैशाली, पिन : 844506
मो 8789335785
लघुकथा जलती हुई नदी
मुझे लग रहा था जैसे मेरे पूरे शरीर में खुजली हो आयी हो। एकबारगी तो मैं डर
गया कि चेचक के दाने ही निकल आये हैं।परंतु डाॅक्टर ने बताया कि मौसम बदलने के
कारण ऐसे दाने उग आते हैं लोगों को।फिर भी फरवरी के महीने में वैसी गर्मी भी
तो नहीं होती।नौकरी में नहीं था मै तब कुछ दूसरी ही बेचैनी थी।पर नौकरी के चार
सालों के बाद मन पहली बार ऐसा उद्विग्न था, न पत्नी से भर मुँह बातें कर पा रहा
था, न दोनों बच्चों को सुबह - शाम घुमाने ले जा पा रहा था। उस दिन तो जवान हो
रही बहन पर तमाचा भी चला दिया था, और तो और , हे ईश्वर ! जीवन में पहली बार
बूढ़ी माँ पर इस तरह झुंझलाया था मैं।
ऑफिस के कितने सारे काम पड़े थे।पता नहीं , मेरे इन हाथों को हो क्या गया
था। कलम चलती ही नहीं थी। भूख भी नहीं लगती थी, पानी भी तो पीने का मन नहीं
करता था। बार - बार वह बूढ़ा नाच जाया करता था मेरी आँखों में। मेरी कुर्सी के
पास जमीन पर घुटनों में सिर छिपाये बैठा , मेरी तरफ कातर दृष्टि से देखने के
बाद वह फटी हुई धोती की गाँठ से दस , पाँच और दो के ढेर सारे मुड़े - तुड़े नोट
निकालता है और मैं उससे झपट लेता हूँ।फिर , साकार हो जाते मेरे बच्चों के
पुराने शर्ट और पत्नी की अकेली साड़ी , जवान होती बहन और माँ की जानलेवा होती जा रही खाँसी।
मुझे लगा जैसे मेरे हाथों की अंगुलियाँ फट गयी हैं और खून बह रहा है, देह पर
जैसे कोई चिनगारी धर रहा हो। दीवार से सटकर बह रही नदी में बचपन से छपकुनियाँ खेलता आया हूँ। इसमें कूदा तो यह तो और भी उबल रही थी। बदले हुए मौसम में नदी भी जल रही थी।
नदी ने मुझे उठाकर फेंक दिया।साइकिल ली और बूढ़े के दरवाजे पर ही दम लिया
।टूटी हुई झोपड़ी में वह अकेले खाट पर सोया हुआ था।मुझे देखा , तो धड़फड़ाकर उठ
बैठा ।मैंने उन मुड़े - तुड़े रुपयों को वैसे ही उसके हाथों पर दे मारा।
बूढ़ा तो जैसे रो ही पड़ा : '' मेरा काम ? बाबू !''
मैने झोले से निकाला : '' ये लो आवास योजना के कागज ।तुम्हारा काम हो गया है ।
''
वह जड़ हो गया।
'' पानी पिलाओ न । '' मैंने टोका ।
वह जैसे नींद से जागा ।और एक गिलास पानी ने मेरी पीड़ा हर ली।
लौटा , तो नदी जैसे उतावली थी मुझे बाँहों में भरने को, आश्चर्य कि देह पर के
लाल दाने भी गायब थे।
लघुकथाः जुलूस
जुलूस बढ़ता आ रहा था।एक का नाम लेकर उसकी कड़ी भर्त्सना की जा रही थी ।भीड़ में
एक बड़ा नेता था , जो सब को अपनी अंगुलियों पर नचा रहा था ।जिस चौक - चौराहे पर
वह चाहता , भीड़ को रोक लेता और जो भी नारा देता , भीड़ वही दुहराती।भीड़ काफी
उत्तेजित और गर्म हो रही थी।उस बड़े नेता के साथ कई छुटभैये नेता भी थे , जो
इधर - उधर खड़े नेताओं को भीड़ में जोड़ते जा रहे थे।थोड़ी ही देर में एक आलीशान
भवन पर पत्थर फेंकने की बात समझाने लगा बड़ा नेता ।सबने गर्मजोशी से साथ देने
का वादा किया ।
तभी धड़धड़ाती हुई एक जीप आयी और बिजली की गति से दर्जन भर लोग उतरे ।सबने भीड़
को घेर लिया।सभी ने बंदूकें थाम रखी थीं ।उनमें भी एक बड़ा नेता था।उसके आदेश
पर भीड़ के छुटभैये नेताओं को बंदूक के कुंदे से पीटा गया।
जीप से निकली भीड़ के नेता ने पहली भीड़ के बड़े नेता का काॅलर पकड़कर हाथ पर टांग
लिया।
ऊपर टंगा हुआ नेता बेबस चीख रहा था।दूसरा नेता अट्टहास कर रहा था, पहले नेता
के विरुद्ध उसी की भीड़ से नारे लगवा रहा था।
भीड़ फिर चलने लगी ।जिन लोगों का खून पहले गर्म किया गया था , अब पानी हो गया
था।चारों तरफ से बंदूकधारियों ने घेर रखा था उन्हें।
जुलूस बढ़ रहा था।भीड़ जिसके खिलाफ थोड़ी देर पहले नारे लगा रही थी , अब उसका
साथ दे रही थी ।पहले जिसका अनुसरण कर रही थी , अब उसके साथ थी।
एक चौराहे पर दूसरे नेता ने पहले नेता को पटक दिया।उसका सिर फट गया।सड़क पर खून
के छींटे बहुत दूर तक फैले।जुलूस पर भी छींटे पड़े।पर , उसे इसका ध्यान नहीं था।
दूसरे नेता के लिए फिर जीप आ गयी।सभी बंदूकधारी चढ़ लिये।जीप उड़ी।भीड़ को होश
आया , उसके पैर सिर पर सवार हो गये।
लघुकथा
मो 8789335785
लघुकथा जलती हुई नदी
मुझे लग रहा था जैसे मेरे पूरे शरीर में खुजली हो आयी हो। एकबारगी तो मैं डर
गया कि चेचक के दाने ही निकल आये हैं।परंतु डाॅक्टर ने बताया कि मौसम बदलने के
कारण ऐसे दाने उग आते हैं लोगों को।फिर भी फरवरी के महीने में वैसी गर्मी भी
तो नहीं होती।नौकरी में नहीं था मै तब कुछ दूसरी ही बेचैनी थी।पर नौकरी के चार
सालों के बाद मन पहली बार ऐसा उद्विग्न था, न पत्नी से भर मुँह बातें कर पा रहा
था, न दोनों बच्चों को सुबह - शाम घुमाने ले जा पा रहा था। उस दिन तो जवान हो
रही बहन पर तमाचा भी चला दिया था, और तो और , हे ईश्वर ! जीवन में पहली बार
बूढ़ी माँ पर इस तरह झुंझलाया था मैं।
ऑफिस के कितने सारे काम पड़े थे।पता नहीं , मेरे इन हाथों को हो क्या गया
था। कलम चलती ही नहीं थी। भूख भी नहीं लगती थी, पानी भी तो पीने का मन नहीं
करता था। बार - बार वह बूढ़ा नाच जाया करता था मेरी आँखों में। मेरी कुर्सी के
पास जमीन पर घुटनों में सिर छिपाये बैठा , मेरी तरफ कातर दृष्टि से देखने के
बाद वह फटी हुई धोती की गाँठ से दस , पाँच और दो के ढेर सारे मुड़े - तुड़े नोट
निकालता है और मैं उससे झपट लेता हूँ।फिर , साकार हो जाते मेरे बच्चों के
पुराने शर्ट और पत्नी की अकेली साड़ी , जवान होती बहन और माँ की जानलेवा होती जा रही खाँसी।
मुझे लगा जैसे मेरे हाथों की अंगुलियाँ फट गयी हैं और खून बह रहा है, देह पर
जैसे कोई चिनगारी धर रहा हो। दीवार से सटकर बह रही नदी में बचपन से छपकुनियाँ खेलता आया हूँ। इसमें कूदा तो यह तो और भी उबल रही थी। बदले हुए मौसम में नदी भी जल रही थी।
नदी ने मुझे उठाकर फेंक दिया।साइकिल ली और बूढ़े के दरवाजे पर ही दम लिया
।टूटी हुई झोपड़ी में वह अकेले खाट पर सोया हुआ था।मुझे देखा , तो धड़फड़ाकर उठ
बैठा ।मैंने उन मुड़े - तुड़े रुपयों को वैसे ही उसके हाथों पर दे मारा।
बूढ़ा तो जैसे रो ही पड़ा : '' मेरा काम ? बाबू !''
मैने झोले से निकाला : '' ये लो आवास योजना के कागज ।तुम्हारा काम हो गया है ।
''
वह जड़ हो गया।
'' पानी पिलाओ न । '' मैंने टोका ।
वह जैसे नींद से जागा ।और एक गिलास पानी ने मेरी पीड़ा हर ली।
लौटा , तो नदी जैसे उतावली थी मुझे बाँहों में भरने को, आश्चर्य कि देह पर के
लाल दाने भी गायब थे।
लघुकथाः जुलूस
जुलूस बढ़ता आ रहा था।एक का नाम लेकर उसकी कड़ी भर्त्सना की जा रही थी ।भीड़ में
एक बड़ा नेता था , जो सब को अपनी अंगुलियों पर नचा रहा था ।जिस चौक - चौराहे पर
वह चाहता , भीड़ को रोक लेता और जो भी नारा देता , भीड़ वही दुहराती।भीड़ काफी
उत्तेजित और गर्म हो रही थी।उस बड़े नेता के साथ कई छुटभैये नेता भी थे , जो
इधर - उधर खड़े नेताओं को भीड़ में जोड़ते जा रहे थे।थोड़ी ही देर में एक आलीशान
भवन पर पत्थर फेंकने की बात समझाने लगा बड़ा नेता ।सबने गर्मजोशी से साथ देने
का वादा किया ।
तभी धड़धड़ाती हुई एक जीप आयी और बिजली की गति से दर्जन भर लोग उतरे ।सबने भीड़
को घेर लिया।सभी ने बंदूकें थाम रखी थीं ।उनमें भी एक बड़ा नेता था।उसके आदेश
पर भीड़ के छुटभैये नेताओं को बंदूक के कुंदे से पीटा गया।
जीप से निकली भीड़ के नेता ने पहली भीड़ के बड़े नेता का काॅलर पकड़कर हाथ पर टांग
लिया।
ऊपर टंगा हुआ नेता बेबस चीख रहा था।दूसरा नेता अट्टहास कर रहा था, पहले नेता
के विरुद्ध उसी की भीड़ से नारे लगवा रहा था।
भीड़ फिर चलने लगी ।जिन लोगों का खून पहले गर्म किया गया था , अब पानी हो गया
था।चारों तरफ से बंदूकधारियों ने घेर रखा था उन्हें।
जुलूस बढ़ रहा था।भीड़ जिसके खिलाफ थोड़ी देर पहले नारे लगा रही थी , अब उसका
साथ दे रही थी ।पहले जिसका अनुसरण कर रही थी , अब उसके साथ थी।
एक चौराहे पर दूसरे नेता ने पहले नेता को पटक दिया।उसका सिर फट गया।सड़क पर खून
के छींटे बहुत दूर तक फैले।जुलूस पर भी छींटे पड़े।पर , उसे इसका ध्यान नहीं था।
दूसरे नेता के लिए फिर जीप आ गयी।सभी बंदूकधारी चढ़ लिये।जीप उड़ी।भीड़ को होश
आया , उसके पैर सिर पर सवार हो गये।
लघुकथा
पेट का सामान
राखियों का थैला लिये इनायत हुसैन बस्ती से गुजर रहे थे, तो याद आया कि जोहर
की नमाज का वक्त हो चला ।बगल में मस्जिद है , इत्तिफाक उनके पाँव उधर ही उठ
गये ।सीढ़ियों पर थैला रखना चाहा , तो मुअज्जिन ने रोक दिया ।
'' मियाँ ! ये गुस्ताखी तो न करो ।ये हिंदुओं के त्योहार का सामान अल्लाह के
दरबार में रख छोड़ोगे ? ''
'' हजरत ! ये हिन्दुओं का नहीं , मेरे पेट का सामान है ।बेचकर चार पैसे लाता
हूँ तो परिवार की परिवरिश होती है ।'' इनायत ने सलाम बजाते हुए कहा।
'' इसी काफिराना हरकत से तुम तरक्की नहीं कर पा रहे हो ।तुम्हारे और भाइयों को
देखो , वे पाँचों वक्त नमाज पढ़ते हैं और इस्लाम के उसूलों पर फिदा हैं ।एक
तुम हो कि मस्जिद मे गाहे ब गाहे दिखते हो और वह भी - - -।'' मुअज्जिन ने नाक
भौं सिकोड़ी।
'' हजरत ! गारंटी दो , तो मैं ये सब छोड़ दूँ।यदि मोहल्लेवालों से तुम्हें
तनख्वाह की रचम न मिले , तो नमाजी करने से एक पेट चला लोगे ? इमाम साहब !
अल्लाह तो इसी रोजी में है ।पहले रोजी , तब रोजा - नमाजी ।''
इनायत की बातों पर इमाम बगलें झाँकने लगे।
**********
राखियों का थैला लिये इनायत हुसैन बस्ती से गुजर रहे थे, तो याद आया कि जोहर
की नमाज का वक्त हो चला ।बगल में मस्जिद है , इत्तिफाक उनके पाँव उधर ही उठ
गये ।सीढ़ियों पर थैला रखना चाहा , तो मुअज्जिन ने रोक दिया ।
'' मियाँ ! ये गुस्ताखी तो न करो ।ये हिंदुओं के त्योहार का सामान अल्लाह के
दरबार में रख छोड़ोगे ? ''
'' हजरत ! ये हिन्दुओं का नहीं , मेरे पेट का सामान है ।बेचकर चार पैसे लाता
हूँ तो परिवार की परिवरिश होती है ।'' इनायत ने सलाम बजाते हुए कहा।
'' इसी काफिराना हरकत से तुम तरक्की नहीं कर पा रहे हो ।तुम्हारे और भाइयों को
देखो , वे पाँचों वक्त नमाज पढ़ते हैं और इस्लाम के उसूलों पर फिदा हैं ।एक
तुम हो कि मस्जिद मे गाहे ब गाहे दिखते हो और वह भी - - -।'' मुअज्जिन ने नाक
भौं सिकोड़ी।
'' हजरत ! गारंटी दो , तो मैं ये सब छोड़ दूँ।यदि मोहल्लेवालों से तुम्हें
तनख्वाह की रचम न मिले , तो नमाजी करने से एक पेट चला लोगे ? इमाम साहब !
अल्लाह तो इसी रोजी में है ।पहले रोजी , तब रोजा - नमाजी ।''
इनायत की बातों पर इमाम बगलें झाँकने लगे।
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