शनिवार, 7 मार्च 2020

डॉ सन्ध्या तिवारी

इंदुमति श्री स्मृति  लघुकथा लिखिए योजना
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लघुकथाकारा है
डाॅ सन्ध्या तिवारी

पीलीभीत, 262001, उ0प्र0
मोबाइल- 7017824491,
ई-मेल-sandhyat70@gmail.com

लघुकथा
समय चक्र

             "समझ में नहीं आता पिद्दी भर की तो तू है, तुझे यह सब कौन बताता है।"
 चीनू  ने आंखें तरेरते हुए कहा : "मुझे क्या? आजकल सबको पता है, मोबाइल और नेट पर सब कुछ मिल जाता है, मेरी भोली मां।"
         आठवीं में पढ़ती बेटी जान्हृवी हंसती हुई चली गई।
         जबरदस्ती खींच कर बड़ा करने वाले समय को देखते हुए, चीनू को लगा घड़घड़ करती उसकी यादों की बाल्टी घिर्री सहित अतीत के कुएं में जा गिरी हो...

        "अड़ाने पर बड़ा बक्सा रखा है उसमें से बर्तन निकाल दो।"मां ने पापा से कहा।
          "अब मैं तो अड़ाने पर चढ़ने से रहा चीनू को चढ़ा दो बर्तन निकाल देगी।"
कहकर पापा शेव करने लगे।
          अब  चीनू बेड से कार्निस, कार्निस से अड़ाने पर यूं चढ़ गई जैसे गौरैय्या एक डाल से दूसरी डाल पर फुदक जाये। कभी -कभार खुलने वाले बक्से बच्चों का कौतूहल तो होते ही हैं। तिस पर अड़ाने पर धरा बड़ा बक्सा, मने घोर तिलिस्म।
           "ला यह परात मुझे दे-दे और यह पीतल का बड़ा लोटा भी निकाल दे।"
               "मां यह गुदड़ी सी तकिया बक्से में क्यों रखी है इसे फेंक दें ?"
      "नहीं न। तुमसे जितना कहा उतना करो और कुछ मत छुओ। बक्सा बंद कर नीचे उतर आओ।"
              "मां, देखने तो दो इसमें एक गोटा किरन वाला लंहगा भी दिख रहा है, निकाल लूं क्या?"
 चीनू ने आशा भरी नजरों से मां को देखा।
          "बक्सा बंद करो। चुपचाप नीचे उतरो ।"
        मां ने आदेशात्मक लहज़े में कहा।
       "अच्छा ठीक है, आप चलो मैं बक्सा बंद कर आती हूं ।"
              नीचे खड़ी मां परात और लोटा लेकर कमरे से निकल गई।
          उसके बालमन ने जैसे कहा गोटा किरन वाला लंहगा एक नज़र देखने में क्या हर्ज है, मम्मी जब तक वापस आयेगी तब तक लंहगा देखकर बक्सा बंद कर दूंगी।
 लंहगा खींचने के लिए जैसे ही गूदड़ तकिया उठाई उसमें से झरझराते हुए ताश की गड्डी  अड़ाने पर बिखर गई । काहे का गोटा काहे की किरन एक-एक पत्ते पर एक-एक मुद्रा छपी थी।  डर और विस्मय से उसने उन न्यूड तस्वीरों की गड्डी जल्दी से तकिये में रख ऐसे भागी जैसे भूत देख लिया हो।
सफेद  पड़े चेहरे को देख  मां ने पूछा था "क्या हुआ ?"
       कोई जवाब  नहीं फूटा था, मुंह से लेकिन हलक़ में हजारों सवाल फंसे थे।

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