इंदुमति श्री स्मृति लघुकथा लिखिए योजना
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लघुकथाकारा है दिव्या राकेश शर्मा
गुरुग्राम, हरियाणा, भारत
लघुकथा
पुष्करिणी
जलाशय के निकट दीप प्रज्वलित कर यशोधरा ने प्रथम पग रखा ही था कि सहसा उसकी नजर एक स्त्री पर पड़ी।
स्त्री का मुख अलौकिक तेज से दमक रहा था।मंत्रमुग्ध हो यशोधरा उनके समीप खींची चली गयी।
"आप कौन है देवी? देवतुल्य आभा युक्त स्त्री से यशोधरा ने प्रश्न किया।
"मैं वहीं हूँ जिसका स्मरण तुम रोज करती हो।"
मधुर स्वर में उन्होंने प्रति उत्तर दिया।
"माते सीता!" इतना कहकर यशोधरा उस स्त्री के चरणों में झुक गई।
उसकी आँखों से अश्रु सरिता की तरह बहने लगे व उस आलौकिक स्त्री के चरणों को भिगोने लगे।
"इस जल को संचित करो यशोधरा। यह यूँ ही व्यर्थ करने के लिए नहीं है।" माता सीता ने यशोधरा को उठाते हुए कहा।
"किन्तु माता जिस स्त्री का पति उसका परित्याग कर चला गया हो उसके जीवन में अश्रु ही लिखें है विद्याता ने।" यशोधरा ने दुखी होकर कहा।
"स्त्री इतनी साधारण कब से हो गई कि वह अपने भाग्य के लिए ईश्वर को दोषी मानें! क्या भाग्य से स्वयं ईश्वर बच सके? "माता ने कहा।
"परंतु…. मैं भी उनके साथ संन्यास ले सकती थी माता । फिर क्यों उन्होंने मेरा त्याग किया? मेरी पीड़ा को क्यों न जान सके!"
"उस पुष्करिणी को देखो यशोधरा… . उसमें संचित जल को देखो।" माता ने कहा।
प्रश्नचित हो यशोधरा जलाशय की ओर देखने लगी।
"जानती हो उसका निर्माण पुरुषों ने किया या स्त्रियों ने? "माँ ने पूछा।
"निस्संदेह पुरुषों ने"यशोधरा ने उत्तर दिया।
"और उसमें एकत्रित जल कहाँ से आया?" माता ने कहा।
"वर्षा से। किन्तु आप यह प्रश्न क्यों पूछ रही हैं माता!"
"यह संसार भी एक पुष्करिणी ही है और हम स्त्रियां वर्षा का जल। जल के बिना
जलाशय अस्तित्वहीन है। वैसे ही हमारे बिना पुरुषों का आधार अस्तित्वहीन है।"
"परंतु माता हमें यह संसार सदैव निर्बल और दीनहीन ही मानता है और हमारे हिस्से में
अश्रु आतें है। "यशोधरा ने कहा।
"स्त्री कभी निर्बल नहीं थी। मैं सीता बनी इसलिए प्रभु पुरषोत्तम कहलाए।"
"तुम यशोधरा हो तभी सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए।"माता सीता ने दृढता से कहा।
माता के शब्दों के तेज से यशोधरा का मन उज्वलित हो गया।
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लघुकथाकारा है दिव्या राकेश शर्मा
गुरुग्राम, हरियाणा, भारत
लघुकथा
पुष्करिणी
जलाशय के निकट दीप प्रज्वलित कर यशोधरा ने प्रथम पग रखा ही था कि सहसा उसकी नजर एक स्त्री पर पड़ी।
स्त्री का मुख अलौकिक तेज से दमक रहा था।मंत्रमुग्ध हो यशोधरा उनके समीप खींची चली गयी।
"आप कौन है देवी? देवतुल्य आभा युक्त स्त्री से यशोधरा ने प्रश्न किया।
"मैं वहीं हूँ जिसका स्मरण तुम रोज करती हो।"
मधुर स्वर में उन्होंने प्रति उत्तर दिया।
"माते सीता!" इतना कहकर यशोधरा उस स्त्री के चरणों में झुक गई।
उसकी आँखों से अश्रु सरिता की तरह बहने लगे व उस आलौकिक स्त्री के चरणों को भिगोने लगे।
"इस जल को संचित करो यशोधरा। यह यूँ ही व्यर्थ करने के लिए नहीं है।" माता सीता ने यशोधरा को उठाते हुए कहा।
"किन्तु माता जिस स्त्री का पति उसका परित्याग कर चला गया हो उसके जीवन में अश्रु ही लिखें है विद्याता ने।" यशोधरा ने दुखी होकर कहा।
"स्त्री इतनी साधारण कब से हो गई कि वह अपने भाग्य के लिए ईश्वर को दोषी मानें! क्या भाग्य से स्वयं ईश्वर बच सके? "माता ने कहा।
"परंतु…. मैं भी उनके साथ संन्यास ले सकती थी माता । फिर क्यों उन्होंने मेरा त्याग किया? मेरी पीड़ा को क्यों न जान सके!"
"उस पुष्करिणी को देखो यशोधरा… . उसमें संचित जल को देखो।" माता ने कहा।
प्रश्नचित हो यशोधरा जलाशय की ओर देखने लगी।
"जानती हो उसका निर्माण पुरुषों ने किया या स्त्रियों ने? "माँ ने पूछा।
"निस्संदेह पुरुषों ने"यशोधरा ने उत्तर दिया।
"और उसमें एकत्रित जल कहाँ से आया?" माता ने कहा।
"वर्षा से। किन्तु आप यह प्रश्न क्यों पूछ रही हैं माता!"
"यह संसार भी एक पुष्करिणी ही है और हम स्त्रियां वर्षा का जल। जल के बिना
जलाशय अस्तित्वहीन है। वैसे ही हमारे बिना पुरुषों का आधार अस्तित्वहीन है।"
"परंतु माता हमें यह संसार सदैव निर्बल और दीनहीन ही मानता है और हमारे हिस्से में
अश्रु आतें है। "यशोधरा ने कहा।
"स्त्री कभी निर्बल नहीं थी। मैं सीता बनी इसलिए प्रभु पुरषोत्तम कहलाए।"
"तुम यशोधरा हो तभी सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए।"माता सीता ने दृढता से कहा।
माता के शब्दों के तेज से यशोधरा का मन उज्वलित हो गया।
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