सोमवार, 9 मार्च 2020

सपना लघुकथाकार मृणाल आशुतोष

इंदुमति श्री स्मृति लघुकथा लिखिए योजना
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लघुकथाकार है मृणाल आशुतोष

समस्तीपुर (बिहार)

लघुकथा

सपना

            भीड़ तेज़ी से लाल चौक की ओर बढ़ रही थी और उसकी संख्या भी बढ़ती ही जा रही थी। नारे की आवाज़ बुलंद और बुलंद होती जा रही थी।
          'भारत तेरे टुकड़े होंगे। इंशा अल्लाह। इंशा अल्लाह!'' भारत तेरे टुकड़े होंगे। इंशा अल्लाह। इंशा अल्लाह! और भीड़ की अगुवाई कर रहा था एक दुर्दांत आतंकवादी जिस पर  सरकार ने एक
करोड़ का ईनाम रखा था। भीड़ में ऐसे लोगों की कमी नहीं थी जिनके हाथों में बंदूक देख उन्हें इंसान कहना, इंसानियत को गाली देने के समान हो। सड़क के किनारे किनारे कुछ पुलिस और सेना के जवान भी थे जो अपने आपको असहाय महसूस कर रहे थे। उनके उबलते खून को नेताओ ने ठंढा कर रखा था। उनके आँखों के सामने उनकी मातृभूमि को कोई रौंद रहा था और वह दर्शक की भाँति चुपचाप देख भर रहे थे। धीरे धीरे स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी। सेना के एक जवान के मुँह पर बंदूक के बट से प्रहार किया गया। मुँह से खून बहने लगा। उसके साथियों ने अपने बंदूकें तान लीं और कैप्टन की ओर देखा। कैप्टन की आँखों ने बन्दूकों को कमजोर कर दिया और वह झुक पड़े। कैप्टन ने माइक सम्भाला:
          "भाइयों और बहनों। कृपया अपना प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से करें।"
          जबाब में ठहाके की आवाज़ गूँजी। इस ठहाके ने जवानों को और भड़का दिया। इस बार उन्होंने खून भरे आँखों से कैप्टन की ओर देखा। अबकी कैप्टन ने कुछ इशारा किया। उसने फिर माइक सम्भाला और सावधान की मुद्रा में आ गया,
       "जन-गण-मन अधिनायक जय
हे, भारत भाग्य विधाता।'
        पीछे पीछे जवानों के तेज़ कोरस ने साथ दिया। सहसा भीड़ थमने लगी। धीरे धीरे उनमे से भी कई लोग सावधान की मुद्रा में खड़े होने लगे। राष्ट्रगान गाने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। अब चलंत भीड़ की संख्या काफी कम दिख रही थी। कैप्टन ने उद्घोष किया:
        "भारत माता की" 'जय' की आवाज़ से पूरा इलाका ही गुंजायमान हो उठा। कैप्टन जारी रहा:
       "भारत माता की" 'जय' की आवाज़ आतंकवादियों से सीने को गोलियों से भी अधिक छलनी कर रहे थे। अब कैप्टन अपने रौ में आ गया,
         "बंदूकधारियों, या तो अपने आपको कानून के हवाले कर दो या गोली खाने के लिये तैयार हो जाओ।"
         सभी बंदूकधारी कानून के गिरफ्त में आ चुके थे।
          'भारत माता की जय' अभी भी इलाके को गुंजायमान कर रही थी।
          ट्रिन-ट्रिन ...ट्रिन-ट्रिन
          अलार्म की आवाज़ से मेरी नींद खुल गयी। घड़ी देखा तो सुबह के पाँच बज रहे थे
             
सुना है कि सुबह का देखा सपना सच होता है। क्या यह सपना भी एक दिन सच होगा?

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लघुकथा

शहीद

           जुम्मे की नमाज़ पढ़ मस्ज़िद से निकल कर अब्दुल बमुश्किल एक फर्लांग चला होगा कि पीछे से आती आवाज़ ने उसके पैरों को रोक दिया ,'रुकिये भाईजान'।
         मुड़ा तो पीछे दो नकाबपोश उसकी ओर तेज़ी से बढ़े चले आ रहे थे। डर के मारे
उसकी घिघ्घी बँध गयी। पर उनके नज़दीक आते ही डर जाता रहा, "अस्सलाम ओ अलैकुम।"
          "अलैकुम ओ अस्सलाम।" अब्दुल अब राहत की साँस ले रहा था।
      "सुना है कि आप काफी दिनों से बेरोजगार हैं और आपकी माली हालत भी ठीक नहीं।"
          "सुना तो ठीक है। पर मैंने आपको पहचाना नहीं।"
          "यही तो दिक्कत है कि आप अपने भाईयों को नहीं पहचानते।"
         "मुआफ़ किजीएगा। पर मैंने आपको पहचाना नहीं।"
           "अपना भाई ही मान लीजिये, जनाब! आप हमारे साथ काम क्यों नहीं करते?"
             "आपके साथ! क्या काम करना पड़ेगा?"
"मुल्क की आज़ादी का!"
             "मुल्क...आज़ादी...कौन सा मुल्क?"
      "अरे अपना मुल्क! काश्मीर। इसे आज़ाद कराना है न काफिरों से! हम भी तो खुदा की
फजल से इसी पाक काम में लगे हैं।"
       "अच्छा!"
         "हाँ! पूरे तीस हजार नकद हर महीने आपके परिवार को मिलेगा। और आपका सारा खर्चा वर्चा हमारा!"
     "पर, यह तो..."
      "मत भूलिये कि आप कितनों दिनों से घर पर बैठे हैं। और खुदा न खासता, अगर आप
जिहाद में शहीद हो गए तो आपके बीवी-बच्चे को पूरे दस लाख दिए जायेंगे।"
.      "............."
    "सोच क्या रहे हैं! क्या अपने मुल्क के लिये आपका कोई फ़र्ज़ नहीं बनता!"
      "भाईजान, आपका मुल्क होगा कोई और! मेरा तो हिंदुस्तान है और वही रहेगा। मैं भूखों मर जाऊँगा पर मुल्क से गद्दारी...न न; मैं अपने मुल्क से गद्दारी नहीं करूँगा। अच्छा तो चलता हूँ! खुदा हाफिज...."

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लघुकथा

कलयुग

        ट्रिन-ट्रिन, ट्रिन-ट्रिन
 दरवाज़े की घण्टी बजी।
        “अब इतने सवेरे सवेरे कौन आ गया।” भनभननाते हुए माला दरवाज़े की ओर बढ़ी।
दरवाज़ा खोला तो सामने रमन को देखकरआश्चर्यचकित हो उठी।
“तुम तो बीस दिन के लिए गाँव गए थे न! एक दिन में ही वापस आ गए। न कोई फ़ोन और न कोई मेसेज।”
“हाँ, ऑफ़िस से एक बहुत ज़रूरी फ़ोन आ गया था। तुम जल्दी से मेरे लिए एक कप कड़क
चाय बनाकर ले आओ।”
कहते हुए रमन सोफ़े पर धम्म से बैठ गया। जूते खोलते हुए वह सोचने लगा।
“अब माला को किस मुँह से कहूँ कि लक्ष्मण जैसा भाई जो पहले मेरी ओर आँख उठाकर देखने वाले का आँख निकाल लेता था, वही भाई मेरे घर बनाने की बात सुनकर गाली-गलौज पर उतर आया। कैसे कह दूँ कि जो भाई पढ़ाई के दौरान बंगलोर में रहते समय मुझे किचेन का कोई काम नहीं करने देता था। मुझे कपड़े साफ़ नहीं करने देता था, वही भाई कल मुझे मारने दौड़ा। “
“लो, चाय लो।”
       पत्नी की आवाज़ से उसकी तन्द्रा भंग हुई।
पहली घूँट के साथ ही वह फिर गाँव पहुँच गया।
कहते हुए मेरे होंठ काँप रहे हैं कि ज़मीन के टुकड़े के लिए अर्जुन और भीम अपने युधिष्ठिर के विरुद्ध दुर्योधन और दुःशासन से मिल गए हैं, और पापाजी...नहीं...नहीं...ऐसे तो वह कभी न थे। हमेशा सत्य और न्याय की बात करने वाले पुत्र मोह में धृतराष्ट्र बन गए हैं। मुझसे ऐसा व्यवहार कर रहे
हैं मानों मैं गांधारी नन्दन न होकर कुंती होऊँ।
चाय ख़त्म हो चुकी है, पर कल की घटना अभी भी रमन को साँस नहीं लेने दे रही थी।
            माँ... माँ.... हर दशहरे में दुर्गा सप्तशती का पाठ करते समय पढ़ता था।
     ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।’
पर आज माता भी कुमाता हो गई। शायद युग बदल गया है। है न माँ!

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