बुधवार, 22 अप्रैल 2020

होता है, होता है : लघुकथा



लघुकथा
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होता है, होता है। 
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          कर्ण कुमार बरामदें में बैठें कोई किताब पढ़ रहे हैं। आंगन में नाती - पोता खेल में मगन है। बेटा भी आज घर से ही आफिस का कामकाज संभाल रहा है। 

       पीज्जा का आर्डर केंसिल हो गया है। 

       बहु नाश्ते के प्रबंध में जुटी है। 

कर्ण कुमार गुनगुनाए "बड़े दिनों में खुशी का दिन आया, आज कोई न पूछो मुझसे मैंने क्या पाया।" 

        अरे! यह क्या कर्ण कुमार जैसे सोते से जाग गये हो, महामारी के प्रकोप की खबरों को देखकर तो वे सिहर  उठे उनके रौंगटे खड़े हो गए। 

तभी छोटा पोता आया और मास्क पहनकर कर बोला: "करोना से डरना मना है।" 

* उदय श्री. ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश