मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

लघुकथा की बात वात्सल्य प्रेम



लघुकथा और मेरा विचार
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लघुकथा वात्सल्य प्रेम
 लेखिका सीमा वर्मा
  वैसे तो  नाम में क्या रखा है। किन्तु नाम तो रखना ही होता है। वर्ना पहचानेंगे कैसे। अक्सर बच्चों के नाम लाड़ प्यार में रखें जाते हैं। जब एक  घर में काम करने वाली बाई मालकिन के बच्चों को कुछ ऐसे नाम से पुकारें तो नौकर और मालिक के बीच की दीवार गिर जाती है।
अब पढ़िए ऐसी ही लघुकथा

वात्सल्य प्रेम

             "कालू...कैसा है रे, मेरा बच्चा!"
          दुलार करती रधिया के बोलते ही रेखा आज चिढ़ -सी गई। अपने बच्चे का कालू नाम सुनकर उसके माथे पर त्योरियां चढ़ आईं। वह मन ही मन सोचने लगी ऐसे तो उसके बेटे का यही नाम प्रचलित हो जाएगा।

         रेखा उसे डांटने ही जा रही थी कि    सांसू मां ने इशारे से उसे चुप रहने के लिए कहा।

          रधिया उनके घर में पिछले बीस सालों से काम कर रही थी। हर दुःख सुख में उन्होंने एक दूसरे का साथ दिया था। वह उसे घर का सदस्य ही समझती थी और बच्चे के प्रति उसके प्रेम  को भी।
              वह बहू को सुनाते हुए बोलीं, "क्यों री रधिया कहांँ से दिख रहा है यह काला, बता तो जरा?"

           रधिया बर्तन धोते- धोते हंँस  पड़ी और बोली, "अरे दीदी, अब क्या बताऊं, यह है ही इतना "सुंदर"

"सुंदर" है तो फिर तू इसे कालू क्यों बुलाती है रे!"

"मैं तो ऐसा इसे बुरी नज़र से बचाने के लिए कहती हूंँ, मगर अब से मैं इसे लालू बुलाऊंगी, वरना यह न हो कि सब मेरे लल्ला को कालू बुलाने लगें!"
              गीली आस्तीन से बालों की लट को हटाती हुई वह हंँसते हुए बोली।

     तभी  सांसू  मांँ ने रेखा की तरफ़ देखा जो यह सुनते ही मुस्कुरा उठी थी।