शुक्रवार, 15 मई 2020

अवगुंठन लघुकथा / दिव्या राकेश शर्मा


सीता परित्याग पर राम का पक्ष विश्लेषित करती दिव्या राकेश शर्मा की लघुकथा पढ़िए :

लघुकथा

अवगुंठन


"एक निरापराध पत्नी का त्याग! यह कैसा पाप किया राम?  यह क्या कर दिया तुमनें राम।"  अंधकार में एक  ध्वनि गूंज उठी।  ध्वनि के कम्पन से भवन के द्वार पर लगे परदे जोर से हिलने लगे।

 "उत्तर दो राम! क्या अपराध था, उस स्त्री का जो ऐसा कठोर दण्ड उसके भाग्य आया " आवाज और कठोर हो गई।
राम ने आँखों से अपनी बाँहों को हटा कर देखा तो सामने एक स्त्री की आकृति थी।
"आप कौन है देवी?" राम ने कहा।
"प्रश्न यह महत्वपूर्ण नहीं कि मैं कौन हूँ। महत्वपूर्ण है, आपका उत्तर! मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए!  सीते के साथ यह पाश्विकता क्यों?" वह आक्रोश के साथ बोली।
"मैं विवश था। मुझे क्षमा करें देवी।" हाथ जोड़कर राम ने कहा और अपने हृदय को जैसे मुठ्ठी में भींच लिया।
"विवश.. हुँ ह.... पुरूष की कैसी विवशता! वह तो सर्वश्रेष्ठ और स्त्री का भाग्य विधाता है। वह प्रेम और दण्ड स्वइच्छानुसार स्त्री को भेंट करता रहता है।"  वह आकृति क्रोध में बोली।
"आप सही कहती हैं देवी।  पुरूष अपनी इच्छानुसार स्त्री को प्रेम देता है।  परंतु यह इच्छा स्त्री के द्वारा ही पुरूष को अधिकार से भेंट स्वरूप दी गई है।"
"आह्..... एक पुरूष के हृदय की पीड़ा!" भूमि पर बैठ गए राम।
"हृदय ! पुरूष के पास हृदय नहीं होता। यदि होता तो हृदयहीन होकर अपनी पत्नी का परित्याग न करता।"
"निष्ठुर हो राम बहुत निष्ठुर ..।"  इतना कहकर वह आकृति रोने लगी।

"हाँ ! मैं निष्ठुर ही हूँ ...... एक निष्ठुर मनुष्य ही अपनी  पत्नी को  समाज के नश्तरों से बचाने के लिए सारे कलंक अपने माथे पर ले लेता है।"
"सीता की अग्निपरीक्षा ली ताकि कोई भी उसकी पवित्रता पर प्रश्न न कर सके और एक संकुचित मानसिकता का कलंक अपने माथे पर ले  लिया।"
"सीते को त्याग दिया ताकि वह सभी के व्यंग भरे नेत्रों से दूर रहे। वह वन में सुख नहीं भोगेगी लेकिन सम्मानित तो  रहेगी।"
मैंने तो सीते के सम्मान के लिए यह वियोग अपना लिया।"
"यह शाब्दिक भ्रमजाल है,  हम स्त्रियों के लिए।" वह आकृति पुनः क्रोध से बोली।
"हाँ ! यह भ्रमजाल ही है, परंतु शाब्दिक नहीं भावात्मक ...... अब न  वर्तमान और न ही भविष्य में सीते से कोई प्रश्न होगा। क्योंकि सभी प्रश्नों का उत्तरदायित्व मुझ पर होगा और एक पत्नी के साथ दुर्व्यवहार का कलंक भी।"
राम के शब्दों को सुनकर वह स्थिर हो गई।

"ओह .......  यह स्त्री मन यह पक्ष क्यों न देख सका!"
इतना कह वह आकृति अदृश्य हो गई।

"कैसे देखता ....  पुरूष सदैव अपनी पीड़ा एक आवरण में छिपाए रखता है।"
पीडित स्वर गुंजा जो राम के हृदय से आया था।

दिव्या राकेश शर्मा
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चित्र साभार सोशल मीडिया