रविवार, 17 मई 2020

डॉ बलराम अग्रवाल

व्यक्तित्व / कृतित्व 
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डॉ बलराम अग्रवाल : सकारात्मक रत्न
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       सन्  2014 की बात होगी  मैं फेसबुक  स्क्रोल कर रहा था कि लघुकथा साहित्य समूह दिखाई पड़ा। एडमिन बलराम। लघुकथा विधा और बलराम जी अपने  युवा अवस्था से ही पसंदिदा है। तुरंत समूह में शामिल होने की फरमाइश कर दी और स्वीकृति भी मिल गई। फिर पता चला ये बलराम दूसरे यानि डॉ बलराम अग्रवाल है। इस नए परिचय का शुक्रिया।




        
         उन दिनों में लघुकथा साहित्य समूह प्रारंभिक दौर में था। तकरीबन 230 सदस्य। मैंने अपनी एक पुरानी लघुकथा "अपना अपना दु:ख"  उसमें पोस्ट की, बाद में उसे बलराम जी ने द्बिप लहरी (अंडमान निकोबार ) पत्रिका में प्रकाशित करवाया था। मेरे लिए यह अद्भुत था। 



           बलराम अग्रवाल जी के सम्पूर्ण साहित्य से मैं वाकिफ नहीं हूं।
         किन्तु उनकी साहित्यिक सक्रियता का मैं कायल हूं।
       लघुकथा विषयक उनके शोध आलेखों का प्रकाशन मील का पत्थर है।
           साहित्य में उनकी सकारात्मक भूमिका, नवोदित लघुकथाकारों को प्रोत्साहित करना, मार्गदर्शन करना, वरिष्ठ लघुकथाकारों में भी उच्च स्तर प्रदान करता है।

      "हिन्दी लघुकथा का मनोविज्ञान,"  "परिंदों के दरमियां,"  "लघुकथा का प्रबल पक्ष"  जो साहित्य से ज़रा भी सरोकार रखते हैं, उन्हें उनकी यह पुस्तकें जरुर पढ़ना चाहिए। 




           "लघुकथा का प्रबल पक्ष" (समकालीन लघुकथा पर आलोचनापरक दृष्टिपात) बलराम जी की यह पुस्तक केंद्रीय हिंदी निदेशालय (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, के माध्यम से प्राप्त वित्तीय सहायता से प्रकाशित हुई है।
में उन्होंने अपनी बात को कितनी सटीकता और कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया है देखिए:

         "बेरोजगारी के दंश से आज का लघुकथाकार पूरी तरह अछूता नज़र आता है। अब वह नौकरी पा गया है, घर में प्रवेश को आतुर हैं। बदकिस्मती यह है कि इस बदले हुए  हालत में भी खड़ा वह अंधकार के बीच ही है। घर के दरवाजे पर लटका ताला खोलने की  कवायद में चाबी उसके हाथ से गिर गयी है; और यही से नौकरी पा गयी इस नौजवान पीढ़ी के नये सरोकारों का पन्ना खुलता है। कभी वह पत्नी की ख्वाहिशें पूरी न कर पाने का जहर पीता है, तो कभी अपनी बच्ची की ख्वाहिशें पूरी न कर पाने का। माता पिता की ख्वाहिशें इस दौर में  अतीत की बात हो गयी लगती है। परिवार की परिभाषा से वे जैसे बाहर हों चुके हैं। जीवन पूरी तरह वैयक्तिक होकर  रह गया है।" 

        बलराम अग्रवाल जी की लघुकथा जो मुझे बेहद पसंद आई "जटायु कब तक लडेगा" । 
          बलराम जी की लघुकथाओ में मैंने जो विशेष बात दर्ज की वह यह कि  उनकी लघुकथाओ के शीर्षक  बहुत लाज़वाब होते हैं। 

उनके दिर्घ यशस्वी जीवन की मैं कामना करता हूं। 

उदय श्री. ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश