कचरा बिन कर अपना पेट पालने वाले भी तो सेवा कर रहे हैं, के पक्ष को पुष्ट करती हुई कुमार गौरव की लघुकथा ।
ड्यूटी
तरूण की छुट्टियों के बीच ही खबर आयी कि इंटेलिजेंस ने भारी घुसपैठ की आशंका जतायी है । अतः अविलंब ड्यूटी पर हाजिर होना पड़ेगा।
सुबह-सुबह पत्नी और पुत्र के साथ ट्रेन पकड़ने निकला तो तरुण का चेहरा उतरा हुआ था।
ऑटो के इंतजार में वे लोग सड़क पर खड़े थे । तभी कंधे पर बोरी लटकाये प्लास्टिक की थैलियां और बोतलें चुनते हुए एक बूढ़ा सामने आया। तरूण से नजरें मिलते ही उसने हाथ उठाकर सलामी दी ।
जबाव में तरूण ने जय हिन्द कहते हुए एक जोरदार फौजी सैल्यूट मारा। बूढ़ा बेचारा डरकर गिरते पड़ते भागा। देखकर सबका हँसते हँसते बुरा हाल हुआ।
ऑटो में बैठने के बाद जब वे थोड़े संयत हुए तो पुत्र ने पुछा:
"उसने पापा को सलाम क्यूँ किया? "
माँ ने उसके बालों पर हाथ फेरा "वो इसलिए बुद्धु की तुम्हारे पापा फौज में हैं। जो सीमा पर रहकर देश की रक्षा करते हैं ।"
बालक को बुद्धु संबोधन पसंद नहीं आया । उसने तुरंत अगला सवाल किया
"अच्छा तो फिर पापा ने उसे सैल्यूट क्यों किया?"
अब जबाव देने की जिम्मेदारी तरूण ने संभाली " देश की असल सेवा तो ये कचरे वाले ही कर रहे हैं। हमलोग तो सीमा पर बस कुत्ते मार रहे हैं।"
कुमार गौरव
