द्रौपदी के मन की बात दिव्या राकेश शर्मा की कलम से लघुकथा रुप में पढ़िए :-
लघुकथा
द्रौपदी
"कौरवों की मृत्यु हो जाने मात्र से न्याय हो गया?"
"क्या सभी अपराधियों को दण्ड मिला?"
"क्या स्त्री का गौरव उसे वापस मिला? मात्र रक्त में केश धोने भर से मेरे अपमान की पूर्ति कैसे हो सकती है?"
ज्वलन्तकारी प्रश्र द्रौपदी ने किए।
"उस अदम्य पीड़ा को मैं समझ सकता हूँ देवी, किन्तु विधाता ने जो लिख दिया वह भोगना पड़ता है। फिर भी कहो इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए मैं कौन सा मार्ग अपनाऊं?"
युधिष्ठिर ने द्रौपदी को उत्तर दिया।
"मेरे मूल अपराधी को दण्ड देकर।"
द्रौपदी ने कहा।
"मूल अपराधी! परंतु वह तो मृत्यु को प्राप्त हो गया है।"
युधिष्ठिर ने आश्चर्य मिश्रित वाणी में कहा।
"नहीं आर्य वह जीवित है और मेरे सामने उपस्थित है।"
द्रौपदी ने घृणा से कहा।
"देवी! मैं अपराधी?" युधिष्ठिर ने व्याकुलता से कहा।
द्रौपदी का अंग अंग क्रोध की अग्नि में जल रहा था।
"हाँ! मुख्य अपराधी आप हैं, और आप सभी भ्राता सहयोगी।"
"अपनी ब्याहता को इस प्रकार ध्रुत क्रीड़ा में सम्पत्ति की तरह दाँव पर लगाना न्यायोचित था? मेरे चीरहरण को चुपचाप देखते रहना न्यायोचित था?"
"मैं विवश था। धर्म के मार्ग पर चलने के लिए अनेक बार मृत्यु का वरण करना पड़ता
है।"
युधिष्ठिर ने संताप से कहा।
"धर्म नहीं अधर्म था यह। यह कृत्य कलंक बन कर सदैव इतिहास में वर्णित होगा।"
द्रौपदी के मुख से जैसे अग्नि बरस रही थी।
"यदि मैं अपराधी हूँ और यह पांडू कुल का कलंक है तो दण्ड निर्धारित करो द्रौपदी!"
युधिष्ठिर ने याचना करते हुए कहा।
"दण्ड! हुँउ….।
भाग्य ने आपको मेरा भाग्य विधाता बनाया है, मैं क्या दण्ड दूंगी?
एक स्त्री के लिए उसका पति उसका सर्वस्व होता है। उसे वह कभी दण्डित होता नहीं देख
सकती।"
द्रौपदी ने व्यंग्यात्मक हँसी में कहा।
"यह हँसी हमारे शीश लज्जा से झुका रहे हैं देवी। हमारी विवशता को अपराध का नाम
न दे।"
ग्लानि से युधिष्ठिर ने कहा।
"कैसी विवशता स्वामी? एक स्त्री के शील की रक्षा करने में पांडव विवश! वह पांडव जिनके शौर्य की गाथा गाई जाती थी और जिनके शौर्य का गान स्वयं श्री हरि ने किया था!!"
द्रौपदी ने कहा।
"धर्म का पालन।" युधिष्ठिर ने मद्धिम स्वर में कहा।
"जो धर्म किसी स्त्री की रक्षा न कर सके वह अधर्म होता है। आपने अधर्म किया है। जब तक मानव सभ्यता है। तब तक यह अधर्म आपके धर्म राज की छवि पर प्रश्न खडे करेगा।"
द्रौपदी के स्वर जैसे ब्रह्मांड में गूंज उठे जिसकी तीव्रता युधिष्ठिर के कानों को भेद रही थी सत्यता की शक्ति के साथ।
दिव्या राकेश शर्मा
लघुकथा
द्रौपदी
"कौरवों की मृत्यु हो जाने मात्र से न्याय हो गया?"
"क्या सभी अपराधियों को दण्ड मिला?"
"क्या स्त्री का गौरव उसे वापस मिला? मात्र रक्त में केश धोने भर से मेरे अपमान की पूर्ति कैसे हो सकती है?"
ज्वलन्तकारी प्रश्र द्रौपदी ने किए।
"उस अदम्य पीड़ा को मैं समझ सकता हूँ देवी, किन्तु विधाता ने जो लिख दिया वह भोगना पड़ता है। फिर भी कहो इस पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए मैं कौन सा मार्ग अपनाऊं?"
युधिष्ठिर ने द्रौपदी को उत्तर दिया।
"मेरे मूल अपराधी को दण्ड देकर।"
द्रौपदी ने कहा।
"मूल अपराधी! परंतु वह तो मृत्यु को प्राप्त हो गया है।"
युधिष्ठिर ने आश्चर्य मिश्रित वाणी में कहा।
"नहीं आर्य वह जीवित है और मेरे सामने उपस्थित है।"
द्रौपदी ने घृणा से कहा।
"देवी! मैं अपराधी?" युधिष्ठिर ने व्याकुलता से कहा।
द्रौपदी का अंग अंग क्रोध की अग्नि में जल रहा था।
"हाँ! मुख्य अपराधी आप हैं, और आप सभी भ्राता सहयोगी।"
"अपनी ब्याहता को इस प्रकार ध्रुत क्रीड़ा में सम्पत्ति की तरह दाँव पर लगाना न्यायोचित था? मेरे चीरहरण को चुपचाप देखते रहना न्यायोचित था?"
"मैं विवश था। धर्म के मार्ग पर चलने के लिए अनेक बार मृत्यु का वरण करना पड़ता
है।"
युधिष्ठिर ने संताप से कहा।
"धर्म नहीं अधर्म था यह। यह कृत्य कलंक बन कर सदैव इतिहास में वर्णित होगा।"
द्रौपदी के मुख से जैसे अग्नि बरस रही थी।
"यदि मैं अपराधी हूँ और यह पांडू कुल का कलंक है तो दण्ड निर्धारित करो द्रौपदी!"
युधिष्ठिर ने याचना करते हुए कहा।
"दण्ड! हुँउ….।
भाग्य ने आपको मेरा भाग्य विधाता बनाया है, मैं क्या दण्ड दूंगी?
एक स्त्री के लिए उसका पति उसका सर्वस्व होता है। उसे वह कभी दण्डित होता नहीं देख
सकती।"
द्रौपदी ने व्यंग्यात्मक हँसी में कहा।
"यह हँसी हमारे शीश लज्जा से झुका रहे हैं देवी। हमारी विवशता को अपराध का नाम
न दे।"
ग्लानि से युधिष्ठिर ने कहा।
"कैसी विवशता स्वामी? एक स्त्री के शील की रक्षा करने में पांडव विवश! वह पांडव जिनके शौर्य की गाथा गाई जाती थी और जिनके शौर्य का गान स्वयं श्री हरि ने किया था!!"
द्रौपदी ने कहा।
"धर्म का पालन।" युधिष्ठिर ने मद्धिम स्वर में कहा।
"जो धर्म किसी स्त्री की रक्षा न कर सके वह अधर्म होता है। आपने अधर्म किया है। जब तक मानव सभ्यता है। तब तक यह अधर्म आपके धर्म राज की छवि पर प्रश्न खडे करेगा।"
द्रौपदी के स्वर जैसे ब्रह्मांड में गूंज उठे जिसकी तीव्रता युधिष्ठिर के कानों को भेद रही थी सत्यता की शक्ति के साथ।
दिव्या राकेश शर्मा
गुरुग्राम, हरियाणा
