नेता पक्ष में रहें या विपक्ष में रहें
हास्य-व्यंग्य तो जीवन का अंग है।
पढ़िए मृणाल आशुतोष की लघुकथा
अभिनेता
फ़िल्म पुरस्कार वितरण समारोह चल रहा था। देश के बहुत सारे गणमान्य व्यक्ति दर्शक दीर्घा में मौजूद थे। पक्ष और विपक्ष के दो प्रमुख नेता भी पहली पंक्ति में बैठे बातचीत में संलग्न थे।
तभी उद्घोषक ने घोषणा की, "इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता अजय कपूर राष्ट्रपति महोदय से पुरस्कार ग्रहण करेंगे।"
" एक्टिंग तो बढिया करता है ये। पर इससे भी बड़े-बड़े अभिनेता मौजूद हैं यहाँ"
मिश्रा जी ने यादव जी के कान में कहा।
"क्या बात करते हैं ? मुझे तो नहीं लगता कि इससे बढिया अभिनेता कोई है, भी अपने देश में!"
"अपने देश का ही है और अभी इस ऑडिटोरियम में मौजूद भी है।"
" इससे बढिया? अरे, कौन है? ज़रा, बदली तो हटाइये।"
"अरे महाराज, आप जानते भी हैं उसको। उसके साथ आपका खाना-पीना, उठना-बैठना है।"
"आपकी कसम नहीं जानते। पहेलियाँ काहे बुझा रहे हैं। बताइये तो सही, आखिर कौन है वह?"
"अरे, आप और हम। और कौन?"
एक पल के लिये दोनों झेंप गए और फिर ठहाका मार कर हँसने लगे।
मृणाल आशुतोष
हास्य-व्यंग्य तो जीवन का अंग है।
पढ़िए मृणाल आशुतोष की लघुकथा
अभिनेता
फ़िल्म पुरस्कार वितरण समारोह चल रहा था। देश के बहुत सारे गणमान्य व्यक्ति दर्शक दीर्घा में मौजूद थे। पक्ष और विपक्ष के दो प्रमुख नेता भी पहली पंक्ति में बैठे बातचीत में संलग्न थे।
तभी उद्घोषक ने घोषणा की, "इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता अजय कपूर राष्ट्रपति महोदय से पुरस्कार ग्रहण करेंगे।"
" एक्टिंग तो बढिया करता है ये। पर इससे भी बड़े-बड़े अभिनेता मौजूद हैं यहाँ"
मिश्रा जी ने यादव जी के कान में कहा।
"क्या बात करते हैं ? मुझे तो नहीं लगता कि इससे बढिया अभिनेता कोई है, भी अपने देश में!"
"अपने देश का ही है और अभी इस ऑडिटोरियम में मौजूद भी है।"
" इससे बढिया? अरे, कौन है? ज़रा, बदली तो हटाइये।"
"अरे महाराज, आप जानते भी हैं उसको। उसके साथ आपका खाना-पीना, उठना-बैठना है।"
"आपकी कसम नहीं जानते। पहेलियाँ काहे बुझा रहे हैं। बताइये तो सही, आखिर कौन है वह?"
"अरे, आप और हम। और कौन?"
एक पल के लिये दोनों झेंप गए और फिर ठहाका मार कर हँसने लगे।
मृणाल आशुतोष
अभाव में भी बच्चे अपने मन की मुरादें पूरी कर ही लेते हैं पढ़िए मृणाल आशुतोष की लघुकथा
मिट्टी के मोती
राष्ट्रीय पर्व की छुट्टी थी और उसका आनंद लेने मैं लॉन्ग ड्राइव पर निकल गया।
हाईवे से गुजर रहा था। छोटी-छोटी पहाड़ियों के बीच की हरियाली ने मुझे कार में ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया। मैं कार से उतरकर प्रकृति के मनोरम दृश्य का रसास्वादन करने लगा।
सहसा 'जन-गण-मन अधिनायक जय हे...' की आवाज़ सुन मैं स्वतः सावधान मुद्रा में आ गया।
राष्ट्रगान खत्म होते ही मैं आवाज़ की दिशा में भागा।
आगे का दृश्य देख मैं जड़वत हो गया। मैले-कुचैले, फटे-पुराने स्कूल ड्रेस में नङ्ग-धड़ंग से बच्चे अपने देश की आवाज़ बुलंद कर रहे थे, "भारत माता की जय।"
उनका समारोह खत्म होते ही एक बच्ची सबके हाथ में थोड़ी-थोड़ी मिट्टी ऐसे डालने लगी मानों मोतीचूर के लड्डू हों।
उनकी चेहरे पर चमकती खुशियाँ देख मेरी आँखें गंगा-जमुना होने लगीं। मेरा हाथ पर्स की ओर बढ़ गया पर दिल ने रुकने का संकेत कर दिया।
" मैं पैसे देकर उनकी अनमोल खुशियों को कम नहीं करना चाहता था।"
मृणाल आशुतोष
मृणाल आशुतोष
द्वारा- श्री तृप्ति नारायण झा(शिक्षक)
ग्राम+पोस्ट- एरौत
भाया-रोसड़ा
जिला-समस्तीपुर (बिहार)
पिन-848210
मोबाईल: 91-8010814932, 8010608038
ईमेल: mrinalashutosh9@gmail. com
