मंगलवार, 2 जून 2020

फेरों का मुहूर्त लघुकथाकार लाजपत राय गर्ग

कभी कभी गलत धारणाओं के चलते भी वातावरण तनावपूर्ण हो जाता है। पढ़िए लाजपत राय गर्ग की लघुकथा




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लघुकथा

फेरों का मुहूर्त

         रात के बारह बजने वाले थे। करीबी रिश्तेदारों तथा वर-वधू परिवारों के लोगों को छोड़कर विवाह समारोह में आमंत्रित लगभग सभी लोग खा-पीकर तथा बधाई-शुभकामनाएं देने का फ़र्ज़ निभाकर जा चुके थे। किन्तु वर-पक्ष के
युवावर्ग के बारातियों ने दुल्हा-दुल्हन को अभी भी स्टेज से उठने नहीं दिया था। डी.जे. की धुनों पर धमाल मचाया हुआ था।
       दुल्हन के पिता को फेरों में विलम्ब होने की चिंता सता रही थी, लेकिन दुल्हे के दोस्तों को रोकने का दुस्साहस नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने अपने
समधी से इस विषय में बात की किन्तु वे भी अपने को असहाय-सा महसूस कर रहे थे।
       अन्तत: उन्होंने फेरों के लिये बुलाये शास्त्री जी से पूछा - 'शास्त्री जी, नाचने-गाने वाले तो बस ही नहीं कर रहे। कहीं फेरों का मुहूर्त तो नहीं निकल जायेगा?'
      शास्त्री जी ने कहा:  'सर, जब हमने इस विवाह की तिथि निर्धारित की थी तो सारा समय शुभ देखकर ही की थी। ऐसे शुभ अवसर जीवन में बार-बार तो आते नहीं। लड़कों को अपने मन की कर लेने दीजिए। जब उनका मन भर जाये और खुद वे थक जायें, अपन फेरे करवा देंगे। घंटा देर से ही, फेरे तो हो ही जायेंगे। आप निश्चिंत होकर आनन्द ले।'

*लाजपत राय गर्ग