बाल सुरक्षा दिवस के अवसर पर पढ़िए ज्ञानप्रकाश "पीयूष" की लघुकथा
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लघुकथा
सत्कार
दो दिन का भूखा बालक होटल के पास आकर खड़ा हो गया। वह खाने-पीने की वस्तुओं को निहार रहा था कि थोड़ी देर बाद होटल के मालिक ने कहा," क्या चाहिए?"
"काम" बालक ने कहा ।
"कैसा काम? " होटल मालिक ने थोड़ी ऊंची आवाज में कहा।
दो दिन का भूखा हूँ, अंकल! कोई काम मिलेगा क्या?"
"होटल बंद करवाने का इरादा है क्या? बाल मजदूरी करवाना अपराध है।"
बालक कुछ समझ नहीं सका । वह होटल के मालिक को टकटकी लगाकर आशा भरी दृष्टि से देखने लगा। भूख के मारे उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। वह निराश होकर जाने लगा।
उसे जाते देख होटल मालिक को अच्छा नहीं लगा । उसके मन में बालक के प्रति करुणा का भाव जागृत हो गया।
उसने बालक को बड़े प्यार से अपने पास बुलाया और छोले- भटूरे की प्लेट देते हुए कहा, " बेटे, पहले यहाँ बैठ कर आराम से खाओ,
फिर मैं तुम्हारे बारे में सोच कर बताऊँगा।"
सुनते ही बालक की पनीली आँखों में चमक दिखाई देने लगी और उसका चेहरा खुशी से धड़कने लगा।
> ज्ञानप्रकाश'पीयूष'
