जब दूसरे के दर्द की इबारत बांच लेते हैं, तब हर तरफ खुशहाली ही होती हैं। पढ़िए:-
नमिता सुंदर की
लघुकथा
किनारा
“क्या कर रही हैं आप यहां इतनी रात?” पुल पर से नदी में झांकती य़ुवती को देख धीरे से साइकिल टिका उसने उसे पीछे से जा पकड़ा।
चौंक कर पलटी वह पर बिना घबड़ाये बोली, “क्यों आपने ही पट्टा लिखा रखा है क्या इस समय यहां होने का।“
“मैं तो ड्यूटी से लौट रहा था, पर आप इस समय यहां....?”
क्यों मैं इस समय यहां क्यों नहीं हो सकती, लड़की हूं इसलिए?’’
“हां, सो तो है ही पर उससे भी ज्यादा इस समय पुल पर बिना किसी काम के........”
“क्यों, हर समय किसी जगह होना किसी काम से ही हो यह जरूरी है क्या? बेमकसद कुछ नहीं किया जा सकता क्या कभी कुछ।”
“काफी इंट्रेस्टिंग बातें करती हैं आप। आइए इधर फुटपाथ पर बैठ कर बात करते हैं”
“क्यों..क्यों बात करते हैं। आप ड्यूटी से लौट रहे थे तो घर जाइए न। कोई इंतजार करने वाला नहीं है क्या?”
“मेरी बात छोड़िए, अपनी कहिए। इतनी रात घर से बाहर, डर नहीं लगा?”
“क्यों डर क्या घर के भीतर नहीं होता?”
उसने ध्यान से देखा उसे,”तो स्थिति इतनी खराब है कि कोई और चारा ही नहीं.... ?”
“पता नहीं, रास्ता, चारा ढूढ़ने का मन नहीं है और क्या करना है, क्यों करना है, कोई अर्थ नहीं है इन सब बातों का। आप जाइए न अपने रास्ते।“
“जा तो नहीं पाऊंगा अब इस तरह।जानती हैं एक दिन मेरी बहन भी खड़ी थी इसी मोड़ पर। उसने कोशिश भी की थी पर हम लोग बांच ही नहीं पाए उसके दर्द की इबारत को चली गयी वह दो नन्हीं बच्चियों को छोड़ कर। अब मैं उन बच्चियों की बात ही नहीं चेहरे का उतार चढ़ाव भी अनदेखा न रह जाय इसकी पूरी कोशिश करता हूं।“
उसने धीरे से उसके हाथ पर अपनी हथेली रख दी।
संभल कर बोला वो—"क्या कोई नहीं है घर में, आस-पास जो समझ सके?”
“सब हैं कहने को। लोग भी, पैसा भी, भरपूर। ऐसा भी नहीं कि बिल्कुल भी समझते नहीं पर पैसा और पावर का लोभ न कभी कभी आदमी को आदमी नहीं रहने देता।“
‘’फिर?’’
‘’फिर क्या आज का प्रोग्राम तो आपने गड़बड़ कर दिया सारा का सारा।“
“कितना तगड़ा सेंस ऑफ ह्यूमर है आपका। बहादुर भी हैं तो कोई न कोई रास्ता तो निकल ही आएगा।कोशिश कीजिये।“
‘’हूं……”
“चलिए आपको घर तक छोड़ दूं। वैसे घर में किसी को पता नहीं कि आप कहां हैं?”
“पार्टी चल रही है..... कोई तो ढूढ़ ही रहा होगा..., पर..ठीक है”
“चलिए फिर”
‘’कैसे छोड़ेगें? साइकिल से?” ....और उसकी आंखों में बच्चों वाली चमक भर गई। “मैं चलाउंगी। सालों से नहीं चलाई। गिरने के पूरे चान्सेस हैं। पर देखा जायेगा।“ एक जोर का पैडल मारा उसने
कुछ दूर डगर-मगर करने के बाद सायकिल की गति धीरे- धीरे स्थिरता पकड़ने लगी।
******
सच ही कहा है कि बच्चे मन के सच्चे। पढ़िए:-
नमिता सुदंर
की लघुकथा
भूख
बैंक में आ वह अपनी सीट पर बैठी ही थी कि पांच साल के बच्चे को गोदी में उठाये माया पर उसकी नजर पड़ी। एक हल्की सी मुस्कान आ गयी चेहरे पर। कितनी बदल गयी है माया पिछले तीन महीने में। कैसी सूखी सकुचाई और गठरी सी सिमटी थी जब अपने मृत पति के स्थान पर कम्पन्सेट्री ग्राउंड पर नौकरी ज्वाइन करने पहले दिन आयी थी शाखा में। कभी कभी बहुत भारी दुख भी न, कैसे राहत बन कर आता है जिंदगी में। पति की शराब की लत, रोज- रोज की मारा कूटी, और ऊपर से उसकी आसामायिक मृत्यु से माया पर जैसे दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ा था पर जब उसकी जगह शाखा में चपरासी के रूप में माया की नियुक्ति हो गयी तो पैसे उसके हाथ आने लगे। और आज वह अपने पोलियो ग्रस्त बच्चे को डाक्टर को दिखाने भी ले आयी थी।
पास आते ही माया बोली,‘’मैडम जी, इसको आपके पास किनारे स्टूल पर बैठा दें। बिल्कुल परेशान नहीं करेगा आपको। लंच में ले जायेंगे डाक्टर साहब के पास। कल उनसे टाइम ले लिया था।’’
‘’हां, हां, बैठा दो और जाओ तुम अपना काम शुरु करो।’’
माया के जाने के बाद उसने ड्राअर से एक टॉफी निकाल कर उसे पकड़ाई, जो बच्चे ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद ले ली। वह अपने कागज पत्रों में व्यस्त हो गयी। बीच बीच में वह मुस्कुरा कर बच्चे को देख लेती थी। बच्चा सचमुच बहुत शांत था, बिना हिले-डुले वैसे ही बैठा था जैसे माया बैठा गयी थी।
अचानक बहुत धीमी आवाज में बच्चे ने कहा, ‘’मैडम जी, एक बात पूछें?’’
उसने सिर उठा, उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुये कहा, ‘’हां, हां पूछो’’
‘’पापा फिर वापस तो नहीं आ जायेंगे?’’
सुनते ही कैसी तो स्तब्ध हो गयी वह। इतने छोटे से बच्चे का यह कैसा अटपटा सा प्रश्न है! उसे लगा उसने ठीक से सुना नहीं. उसने बच्चे से कहा, ‘’क्या पूछ रहे हो, बेटा?’’
बच्चे ने अपनी बड़ी बड़ी भोली आंखे उसके चेहरे पर टिका, अपनी बात दुहरा दी।
उसे समझ में नहीं आया बच्चा अपने पापा के जाने को कितना और कैसे समझ रहा है। अपने को सम्हालते हुय़े बच्चे से पूछा, ‘’ऐसा क्यों पूछ रहे हो बेटा?’’
तुष्टि भरी एक नन्हीं सी मुस्कान आयी उसके चेहरे पर, बोला वह, ‘’जब से पापा गये. हैं न मैडम जी, पेट भर खाना मिलता है।’’ और भरोसे से भरी उसकी भोली दृष्टि दूर काम करती माया पर जा टिकी।
नमिता सुदंर
लखनऊ
नमिता सुंदर की
लघुकथा
किनारा
“क्या कर रही हैं आप यहां इतनी रात?” पुल पर से नदी में झांकती य़ुवती को देख धीरे से साइकिल टिका उसने उसे पीछे से जा पकड़ा।
चौंक कर पलटी वह पर बिना घबड़ाये बोली, “क्यों आपने ही पट्टा लिखा रखा है क्या इस समय यहां होने का।“
“मैं तो ड्यूटी से लौट रहा था, पर आप इस समय यहां....?”
क्यों मैं इस समय यहां क्यों नहीं हो सकती, लड़की हूं इसलिए?’’
“हां, सो तो है ही पर उससे भी ज्यादा इस समय पुल पर बिना किसी काम के........”
“क्यों, हर समय किसी जगह होना किसी काम से ही हो यह जरूरी है क्या? बेमकसद कुछ नहीं किया जा सकता क्या कभी कुछ।”
“काफी इंट्रेस्टिंग बातें करती हैं आप। आइए इधर फुटपाथ पर बैठ कर बात करते हैं”
“क्यों..क्यों बात करते हैं। आप ड्यूटी से लौट रहे थे तो घर जाइए न। कोई इंतजार करने वाला नहीं है क्या?”
“मेरी बात छोड़िए, अपनी कहिए। इतनी रात घर से बाहर, डर नहीं लगा?”
“क्यों डर क्या घर के भीतर नहीं होता?”
उसने ध्यान से देखा उसे,”तो स्थिति इतनी खराब है कि कोई और चारा ही नहीं.... ?”
“पता नहीं, रास्ता, चारा ढूढ़ने का मन नहीं है और क्या करना है, क्यों करना है, कोई अर्थ नहीं है इन सब बातों का। आप जाइए न अपने रास्ते।“
“जा तो नहीं पाऊंगा अब इस तरह।जानती हैं एक दिन मेरी बहन भी खड़ी थी इसी मोड़ पर। उसने कोशिश भी की थी पर हम लोग बांच ही नहीं पाए उसके दर्द की इबारत को चली गयी वह दो नन्हीं बच्चियों को छोड़ कर। अब मैं उन बच्चियों की बात ही नहीं चेहरे का उतार चढ़ाव भी अनदेखा न रह जाय इसकी पूरी कोशिश करता हूं।“
उसने धीरे से उसके हाथ पर अपनी हथेली रख दी।
संभल कर बोला वो—"क्या कोई नहीं है घर में, आस-पास जो समझ सके?”
“सब हैं कहने को। लोग भी, पैसा भी, भरपूर। ऐसा भी नहीं कि बिल्कुल भी समझते नहीं पर पैसा और पावर का लोभ न कभी कभी आदमी को आदमी नहीं रहने देता।“
‘’फिर?’’
‘’फिर क्या आज का प्रोग्राम तो आपने गड़बड़ कर दिया सारा का सारा।“
“कितना तगड़ा सेंस ऑफ ह्यूमर है आपका। बहादुर भी हैं तो कोई न कोई रास्ता तो निकल ही आएगा।कोशिश कीजिये।“
‘’हूं……”
“चलिए आपको घर तक छोड़ दूं। वैसे घर में किसी को पता नहीं कि आप कहां हैं?”
“पार्टी चल रही है..... कोई तो ढूढ़ ही रहा होगा..., पर..ठीक है”
“चलिए फिर”
‘’कैसे छोड़ेगें? साइकिल से?” ....और उसकी आंखों में बच्चों वाली चमक भर गई। “मैं चलाउंगी। सालों से नहीं चलाई। गिरने के पूरे चान्सेस हैं। पर देखा जायेगा।“ एक जोर का पैडल मारा उसने
कुछ दूर डगर-मगर करने के बाद सायकिल की गति धीरे- धीरे स्थिरता पकड़ने लगी।
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सच ही कहा है कि बच्चे मन के सच्चे। पढ़िए:-
नमिता सुदंर
की लघुकथा
भूख
बैंक में आ वह अपनी सीट पर बैठी ही थी कि पांच साल के बच्चे को गोदी में उठाये माया पर उसकी नजर पड़ी। एक हल्की सी मुस्कान आ गयी चेहरे पर। कितनी बदल गयी है माया पिछले तीन महीने में। कैसी सूखी सकुचाई और गठरी सी सिमटी थी जब अपने मृत पति के स्थान पर कम्पन्सेट्री ग्राउंड पर नौकरी ज्वाइन करने पहले दिन आयी थी शाखा में। कभी कभी बहुत भारी दुख भी न, कैसे राहत बन कर आता है जिंदगी में। पति की शराब की लत, रोज- रोज की मारा कूटी, और ऊपर से उसकी आसामायिक मृत्यु से माया पर जैसे दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ा था पर जब उसकी जगह शाखा में चपरासी के रूप में माया की नियुक्ति हो गयी तो पैसे उसके हाथ आने लगे। और आज वह अपने पोलियो ग्रस्त बच्चे को डाक्टर को दिखाने भी ले आयी थी।
पास आते ही माया बोली,‘’मैडम जी, इसको आपके पास किनारे स्टूल पर बैठा दें। बिल्कुल परेशान नहीं करेगा आपको। लंच में ले जायेंगे डाक्टर साहब के पास। कल उनसे टाइम ले लिया था।’’
‘’हां, हां, बैठा दो और जाओ तुम अपना काम शुरु करो।’’
माया के जाने के बाद उसने ड्राअर से एक टॉफी निकाल कर उसे पकड़ाई, जो बच्चे ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद ले ली। वह अपने कागज पत्रों में व्यस्त हो गयी। बीच बीच में वह मुस्कुरा कर बच्चे को देख लेती थी। बच्चा सचमुच बहुत शांत था, बिना हिले-डुले वैसे ही बैठा था जैसे माया बैठा गयी थी।
अचानक बहुत धीमी आवाज में बच्चे ने कहा, ‘’मैडम जी, एक बात पूछें?’’
उसने सिर उठा, उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुये कहा, ‘’हां, हां पूछो’’
‘’पापा फिर वापस तो नहीं आ जायेंगे?’’
सुनते ही कैसी तो स्तब्ध हो गयी वह। इतने छोटे से बच्चे का यह कैसा अटपटा सा प्रश्न है! उसे लगा उसने ठीक से सुना नहीं. उसने बच्चे से कहा, ‘’क्या पूछ रहे हो, बेटा?’’
बच्चे ने अपनी बड़ी बड़ी भोली आंखे उसके चेहरे पर टिका, अपनी बात दुहरा दी।
उसे समझ में नहीं आया बच्चा अपने पापा के जाने को कितना और कैसे समझ रहा है। अपने को सम्हालते हुय़े बच्चे से पूछा, ‘’ऐसा क्यों पूछ रहे हो बेटा?’’
तुष्टि भरी एक नन्हीं सी मुस्कान आयी उसके चेहरे पर, बोला वह, ‘’जब से पापा गये. हैं न मैडम जी, पेट भर खाना मिलता है।’’ और भरोसे से भरी उसकी भोली दृष्टि दूर काम करती माया पर जा टिकी।
नमिता सुदंर
लखनऊ
