बबिता कंसल की लघुकथा पढ़िए:-
उडान बाकी है
"दीदी मै जीना नही चाहती "। "पगली जीवन बार बार नही मिलता , प्रकृति ही हमे जीवन प्रदान करती है,कुछ निशचित समय के लिए ......। जीवन खत्म करना प्रकृति के नियम के विरूद्ध है । "पर रीता दीदी....... मां ,बापू क्या सोचेगें "? "राधा ....... महनत करने वालो की कभी हार नही होती। बहुत रास्ते है ,मंजिल पाने के लिए। धैर्य , हौसला रखो! तुम कामयाब होगी ,ये मेरा विश्वास है । जीवन के प्रति अविश्वास ठीक नही ।आने वाला समय तुम्हे और आगे ले जा सकता है। "दीदी माँ ,बापू ने बहुत महनत करके पैसा इक्टठा कर गावँ से पढने भेजा था ,। कैसे बताऊगी मै असफल रही "? "राधा तुम को ये भी ख्याल नही आया उनका ।उन दोनो पर क्या गुज़रेगी "? तुम्हारे मां बापू भी आते ही होगें मैने उन को फोन कर बुला लिया है। "राधा बेटी तुम हौसलों के साथ उडा़न भरो नील गगन मे हम सब तुम्हारे साथ है "।उसको पीछे से आ बाँहो मे भरते हुए मां बोली । मां की बात सुन राधा के अवसाद से भरे मन को जैसे दो बूँदे जल की मिल गयी हो । बबिता कंसल दिल्ली
