जो आंतक के सिवाय कुछ सोच नहीं सकते उनको इंसानियत की चीख-पुकार कहाँ सुनाई
पड़ती है?
मृणाल आशुतोष की लघुकथा
पढ़िए :-
लघुकथा
बहरा
खट-खट खट-खट!
नींद खुल गयी राधिका की।
ऐसा लगा मानो कोई दरवाजा खटखटा रहा हो!
हो सकता है कि 'मैंने कोई सपना देखा हो', यह सोच कर वह फिर से सोने की कोशिश
करने लगी।
फिर वही आवाज़ खट-खट खट-खट!
उसने पति राजेश को जगाने की कोशिश की,"सुनो जी! कोई दरवाजा खटखटा रहा है।"
"तुम्हारे कान बज रहे होंगे। इतनी रात में और कड़ाके की सर्दी में कौन दरवाजा
खटखटायेगा? सो जा। रात बहुत हो चुकी।" राजेश ने बन्द आँखों से ही अपना निर्णय
सुना दिया।
खट-खट की आवाज़ जारी थी।
राधिका ने अबकी राजेश को झकझोरा,"घोड़े बेचकर सोना बंद करो। सुनो गौर से। कोई
दरवाजा खटखटा रहा है।"
"ओह्ह! कौन हो सकता है इस वक्त? तू सच कह रही है। सच में खटखटाने की आवाज़ आ
रही है। देखता हूँ कौन है!" राजेश ने आँख मलते हुए दरवाजे का रूख किया।
"रुको! कहीं कोई आतंकवादी तो नहीं..."
राजेश ने अपने बढ़े कदम खींच लिए।
"कोई ज़रूरतमंद भी हो सकता है!" राधिका बुदबुदाई।
राजेश ने आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया।
"आदाब भाईजान! ठंढ बहुत है। थोड़ा अलाव मिलेगा क्या!" आगन्तुक ने पूछा।
"हाँ। हाँ। क्यों नहीं! राधिका, जा अलाव लाकर दे भाई को।"
"राधिका!" आगन्तुक बुदबुदाया।
और उसकी आँखें घर का एक्स रे करने लग गयीं ।
फिर उसकी नज़र एक मूर्ति पर टिक गयी जिस पर फूल-माला चढ़ा हुआ था। अब उसके हाव
भाव बदलने लगे।
उसने अपने ओवरकोट
के भीतर से कुछ निकाला।
धाँय-धाँय की आवाज़ हुई और वह चिल्लाया,"लेके रहेंगे
आज़ादी। जन्नते काश्मीर हमारा है।"
धाँय की आवाज़ सुनते ही राधिका
ज़ोर से पलटी। पति को ज़मीन पर गिरे देख माजरा समझने
में उसे पल भर का देर न लगा।
वह चीखी,"राजेश!"
"......"
आगंतुक वहाँ से अपने कदम बढ़ा चुका था।
वह चिल्लायी,
"रूक जा मौत के सौदागर!
मेरे पति ने तो तुझे इंसान समझ कर दरवाजा खोला था।
दिखने में तो तुम शरीफ़ लगते थे। पर तुम निकले क्या? शैतान।
थूकती हूँ तुम पर!
राधिका की चीख से सारे मुहल्ले की नींद खुल गयी थी।
आगंतुक पर इसका कोई फर्क
नहीं था!
वह बिना मुड़े अपने रास्ते बढ़ता जा रहा था।
बस बढ़ता ही जा रहा था।
****
सास को अंतिम बेला में यह एहसास हो रहा था कि उसने अपनी बहुओं के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। तो बहुओं ने सास से कौन-सा आशीर्वाद मांगा?
पढ़िए :-
लघुकथा
आशीर्वाद
चला-चली की बेला हो चुकी थी। माताजी का गला रूंधने लगा था। आवाज़ की स्पष्टता
धीरे धीरे कम होने लगी थी।
तीनों बहुएं लिपटी हुई थीं।
बड़ी दोनों हाथ पकड़ कर
रो रही थी तो छोटी दोनों पैर पकड़कर। मंझली ने सास का सर अपने गोद में ले लिया
था।
सास ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा :
"जब से तुम तीनों इस घर में बेटी बन कर आई!
हमने कभी बेटी तो छोड़ बहू भी न समझा। खूब सताया, जी भर परेशान किया। गालियाँ
दीं, तुम लोगों के मायके को लानतें भेजीं पर... पर अब।
"पर अब क्या अम्मा?" छोटी बहू के आँखों से सैलाब ही फूट पड़ा।
"पर अब सब कहा-सुनी माफ करना। अब जा रही हूं। माफ कर देना अपनी माँ समझ कर।"
"नहीं अम्मा। तुम छोड़ कर हमें नहीं जा सकती। पुरानी बातों को भूल जाओ। हम तेरे
बिन नहीं जी सकते। तुम्हारे पोते-पोती तो जीते-जी मर जायेंगे।" मँझली बहू का
गला भर्रा गया था।
....सास ने कुछ बोलना चाहा पर मुँह से आवाज निकलना बंद हो चुका था।
बहूओं का रोना अब चीत्कार में अब बदल चुका था।
सास ने हाथ उठाया मानों आशीर्वाद देना चाह रही हो।
"अम्मा जा रही हो तो जाते-जाते बस इतना आशीर्वाद देती जाओ कि कल जब हम सब सास
बनें तो तुम्हारी छाया भी हम पर न पड़े।"
बड़ी बहू ने लम्बी साँस लेकर कहा।
मृणाल आशुतोष
द्वारा- श्री तृप्ति नारायण झा(शिक्षक)
ग्राम+पोस्ट- एरौत
भाया-रोसड़ा
जिला-समस्तीपुर (बिहार)
पिन-848210
मोबाईल: 91-8010814932, 8010608038
ईमेल: mrinalashutosh9@gmail. com

