लघुकथा
अंजाना वह
सुंदर दिवस था। सभी प्रसन्नतापूर्वक अपने अपने कार्य में व्यस्त थे।
कोई संगीत सुन रहा था, कोई संगीत की धुन पर थिरक रहा था। कोई गीत गा रहा था, कोई गीत बुन रहा था।
किसी ने घंटा बजाया। किसी ने अज़ान किया। किसी ने मत्था टेका। कोई योग सिद्धि में तल्लीन था।
सूरज हुआ मद्धम। दिन में ही तारे दिखाई देने लगे।
तभी एक मार्ग से लम्बी काली परछाई उभरी। भयानक आवाज़ वातावरण में गूंज उठी:
"क्या? तुम सब लोग जानते हो तुम कौन हो?"
सभी ने एक स्वर में दृढ़तापूर्वक कहा:
"हां! हम सभी मनुष्य है।"
सूरज हुआ प्रखर। अब सभी की परछाइयां बहुत ही छोटी छोटी हो गई थी।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश भारत
