सोमवार, 2 नवंबर 2020

लघुकथा न जाने क्यों

लघुकथा 

 न जाने क्यों 

मैं बस स्टॉप पर खड़ा बस की प्रतीक्षा कर रहा था! 

पान के ठेले पर गीत बज रहा था! 


"न जाने क्यों होता है, ये जिंदगी के साथ अचानक यह मन किसी के जाने के बाद करें फिर उसकी याद छोटी छोटी सी बात........" 


जैसा कि अक्सर होता था,  आज भी हुआ 'वह' बाइक सवार मेरे पास आकर  रुका और उसने मुझ से कहा : "चलिए बाबूजी आपको छोड़ देता हूं!"  

और मैं 'जी! अच्छा कह कर उस की बाइक की पिछली सीट पर सवार हो गया!' 

उसने बाइक चला दी! उसके दाहिने हाथ में टंगा हुआ हेलमेट देखकर अक्सर मेरे मस्तिष्क में कई  भयावह तस्वीरें उभरने लगती है! 

 उसका हेलमेट कुछ ऐसा था। जैसे क्रिकेट की पीटी हुई गेंद हो उसमें इलास्टिक तो थी ही नहीं! 

 अब मैं अपने गंतव्य पर नियत समय पर पहुंचने से आश्वस्त हो गया था!


निर्धारित स्थान पर उस व्यक्ति ने मुझे छोड़ दिया था।


मैंने उसे धन्यवाद के साथ कहा: "भैया जी! भले ही मुझसे रुपए ले लो, किंतु एक नया हेलमेट जरूर खरीद लो।

उसने जवाब दिया,  "बाबूजी यह हेलमेट मुझे पड़ा हुआ ही मिला है और वह आगे बढ़ गया!"  

मैं सोचता ही रह गया। 

न जाने क्यों ........ 


 उदय श्री. ताम्हणे 

पता : एच - ए 118/71, शिवाजी नगर, 

भोपाल - 462003 

मध्य प्रदेश 




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