लघुकथा
नीला गुलाब
विजेता , वीरेंद्र के बगलवाली सीट पर आकर बैठी , वीरेंद्र ने गाडी स्टार्ट की और चल पड़ी होटल मधु विहार ! वीरेंद्र गुन गुना रहा था , ये शाम मस्तानी .......
विजेता मंद - मंद मुस्करा रही थी !
पार्टी पुरे शबाब पर थी, रात के ११ बज चुके थे ! विजेता ने कहा : वीरेन्द चलो अब घर ! आज पहली बार विजेता को वीरेंद्र ऐसी पार्टी में लाया था ! वे दोनो बाहर आकर कार में बैठ गए ! विजेता ने अपना पर्स पीछेवाली सीट पर उछाल दिया ! उसमे रखा नीला गुलाब का फूल भी बाहर उछल पड़ा और मुस्कराने लगा !
वीरेंद्र की नजर उस पर पड़ी !
वीरेंद्र ने पूछा : विजेता ये नीला गुलाब तुम्हारे पास कैसे आया !
ये मुझे आपके परिचित मनीष ने दिया है ! विजेता ने सहज कहा !
वीरेंद्र का पारावार नहीं रहा ! तू भी हराम ......... ! उसने दिया , और तुमने ले के रखा लिया ? फेक देती उसके मुंह पर !
देख लूंगा उस साले मनीष को भी !
अब सिर्फ कार की आवाज आ रही थी ! 15 मिनिट बाद कार पोर्च में शांत हुई ! वे दोनों फ्लेट में दाखिल हुए !
विजेता बड़ बड़ाई : अब मेरी क्या गलती है !
वीरेंद्र के कानो में पारा घुल गया ! उसका हाथ लहराया, विजेता के शरीर पर पड़ने ही वाला था कि न जाने कहा से विजेता के हाथो में बल आ गया और उसने कस कर वीरेंद्र का हाथ पकड़ा और पूरी ताकत से उसे दूर धकेल दिया !
पास में पड़े स्टूल पर वीरेंद्र जा कर बैठ गया !
कमरा नीले गुलाब कि खुशबु से महक रहा था !
उदय श्री. ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश भारत
