शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

लघुकथा : नीला ग़ुलाब

 






लघुकथा 

नीला गुलाब 

विजेता , वीरेंद्र के बगलवाली सीट पर आकर बैठी , वीरेंद्र ने गाडी स्टार्ट की और चल पड़ी होटल मधु विहार ! वीरेंद्र गुन गुना रहा था , ये शाम मस्तानी .......

विजेता मंद - मंद मुस्करा रही थी !

पार्टी पुरे शबाब पर थी, रात के ११ बज चुके थे ! विजेता ने कहा : वीरेन्द चलो अब घर ! आज पहली बार विजेता को वीरेंद्र ऐसी पार्टी में लाया था ! वे दोनो बाहर आकर कार में बैठ गए ! विजेता ने अपना पर्स पीछेवाली सीट पर उछाल दिया ! उसमे रखा नीला गुलाब का फूल भी बाहर उछल पड़ा और मुस्कराने लगा !

वीरेंद्र की नजर उस पर पड़ी !

वीरेंद्र ने पूछा : विजेता ये नीला गुलाब तुम्हारे पास कैसे आया ! 

ये मुझे आपके परिचित मनीष ने दिया है ! विजेता ने सहज कहा !

वीरेंद्र का पारावार नहीं रहा ! तू भी हराम ......... ! उसने दिया , और तुमने ले के रखा लिया ? फेक देती उसके मुंह पर !

देख लूंगा उस साले मनीष को भी ! 

अब सिर्फ कार की आवाज आ रही थी ! 15 मिनिट बाद कार पोर्च में शांत हुई ! वे दोनों फ्लेट में दाखिल हुए ! 

विजेता बड़ बड़ाई : अब मेरी क्या गलती है ! 

वीरेंद्र के कानो में पारा घुल गया ! उसका हाथ लहराया, विजेता के शरीर पर पड़ने ही वाला था कि न जाने कहा से विजेता के हाथो में बल आ गया और उसने कस कर वीरेंद्र का हाथ पकड़ा और पूरी ताकत से उसे दूर धकेल दिया !

पास में पड़े स्टूल पर वीरेंद्र जा कर बैठ गया !

कमरा नीले गुलाब कि खुशबु से महक रहा था ! 


उदय श्री. ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश भारत