लघुकथा
भटकती आत्माएं
वहां कोई भी जाने के लिए तैयार नहीं था। आमतौर पर कालोनियों में कोई दिवंगत होता तो कुछ समय के लिए ही सही, उसके पास सभी जाते थे। श्रद्धा सुमन अर्पित करते थे। पर अब ऐसे नजारे कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे।
बमुश्किल चार लोग एकत्र हो पाए थे!
दिवंगत को तिलांजली भी न हो पा रही थी।
एक ने कहा: "तिलांजलि न हुई, तो दिवंगत की मुक्ति कैसे होगी?"
सवालों के किसी के पास जवाब नहीं थे।
प्रकृति से खिलवाड़ का असर था।
वायरस जोर पकड़ रहा था। सावधानी ही बचाव था.
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश भारत
