लघुकथा
खुशी के रंग
"जरा सोचो मेघना! अपनी नाजो से पली चिरैया....
जिसे हमने सब सुख सुविधाओं के साथ पाला, अभी आगे भी तो पढना चाहती है ....!"
इतने बड़े संयुक्त परिवार मे रह पाएगी......?"
"वो भी बड़ी बहू ....
सोचा है। कितनी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी....
ना कर पायी तो ....?
"चिरैया से भी पूछो .... !"
"क्यों नही निभा पाएगी?"
"इतना अच्छा परिवार, इतना पढा लिखा संस्कारी लड़का इतना बड़ा कारोबार, रूपया-पैसा सभी तो है, और उसे पढाने को वो राजी हैl
अपनी शिक्षा आगे ले सकती है।"
"रही जिम्मेदारी तो प्यार और अपनत्व से वो भी उठा लेगी मेरी बेटी ....।
"संयुक्त परिवार में सब का साथ और प्यार भी मिलता है। जिम्मेदारी ही होती है, ऐसी सोच ठीक नही "।
"बिटिया तुम्हारी कभी हां और कभी ना सुन कर दुविधा मे थी मै ! कही मैं गलत फैसला तो नही ले रही?"
दिल को मजबूत कर ये कड़ा फैसला ले लिया था। ये सोचकर, कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता।
लेकिनआज जब देखती हूँ। "प्यार, अपनत्व से उन को अपनाया तुमने ....
जिम्मेदारी निभाते अपने पति के साथ सास, नन्द पूरे परिवार से भरपूर प्यार, आदर पाते मन बावरा खुशी से झुमने लगता है।"
"खुश रहो ....
मेरी चिरैया।"
बबिता कंसल
दिल्ली
