दैनिक जीवन में अनजाने में ही सही कितने ही गिले शिकवे, हम अपने दिलो-दिमाग में शामिल कर लेते हैं। पता भी नहीं चलता। लेकिन इसके दुष्प्रभाव को जानना समझना जरूरी है। इस विचार को रेखांकित करती हुई, अंजू खरबंदा की लघुकथा "गिले शिकवों की पोटली"
रिन्नी काफी दिनों से बीमार चल रही थी।
बचपन की सहेली रीता मिलने के लिए उसके घर पहुँच गई।
रीता कुछ देर रिन्नी के पास बैठी। फिर जैसे ही खिङकी के परदे हटाए, वैसे ही छनछनाती रोशनी कमरे में भर गई।
पूरा घर अस्त-व्यस्त हो रहा था। कमरे में बिखरा हुआ सामान समेटते हुए रीता को अखबारों के बीच एक डायरी मिली।
"रिन्नी! ये डायरी तेरे काम की है या कबाङ में फेंक दूं!"
"दिखा तो जरा! अरे ये कहाँ मिली! मुझे रोज डायरी लिखने की आदत थी। रोज रात को सोने से पहले जरूर लिखा करती थी। अब तो बहुत दिनों से नहीं लिख पाई हूं।"
"अच्छा जी! क्या लिखा है डायरी में, देखूं तो जरा!"
कहकर रीता ने डायरी खोली और पढ़ने लगी। पन्ना दर पन्ना पढ़ती ही चली गई....
"आज छोटी ननद ऊषा ने नमक कम होने पर कैसी जली कटी सुना दी। मौका आने पर बदला न लिया तो मेरा नाम भी रिन्नी नहीं।"
"आज सुबह सुबह सुकेश ने चार बातें सुना दी। पता नहीं ये पति अपने आप को समझते क्या हैं।"
"आज आफिस में फाइल न मिलने पर अर्चना से फालतू की बहस हो गई। छोटी पोस्ट पर होकर भी जुबान चलाती है मुझसे।"
"आज बच्चों का रिजल्ट लेने स्कूल गई। क्लास टीचर ने खरी खोटी सुनाकर सारे मूड का सत्यानाश कर दिया।"
"कल सासु माँ आ रही है गाँव से। अब जाने कितने दिन उनकी चाकरी करनी होगी।"
रिन्नी.... अब समझ आया तेरी बीमारी का कारण!
ये जो गिले शिकवों की पोटली तूने अपने दिल पर रखी है ना....
यह भार ही तेरी सारी परेशानियों का कारण है।"
"मतलब!" रिन्नी ने चौंक कर पूछा।
"पहले तूने इन बातों को सुना, फिर सोचा, फिर रात होने तक दिल में रखा ताकि डायरी में लिख सके। परत दर परत जमा किया इन नकारात्मक बातों को अपने अंदर।"
"तो क्या करूँ? भूल जाऊं सब!"
"हाँ! भूल जा सब गिले शिकवे....
"मतलब!" रिन्नी ने चौंक कर पूछा।
"पहले तूने इन बातों को सुना, फिर सोचा, फिर रात होने तक दिल में रखा ताकि डायरी में लिख सके। परत दर परत जमा किया इन नकारात्मक बातों को अपने अंदर।"
"तो क्या करूँ? भूल जाऊं सब!"
"हाँ! भूल जा सब गिले शिकवे....
