सोमवार, 25 जनवरी 2021

दनुजनिरोषिणि लघुकथाकार अंकिता भार्गव

 लघुकथा 


  पिता  वी. एल. भार्गव
  माता  कान्ता देवी 

      शिक्षा  एम. ए. 
      (लोक प्रशासन)
      रूचियां  अध्ययन एवं लेखन । अनुभव  सरिता, गृहलक्ष्मी, पलाश, राजस्थान पत्रिका, दैनिक समाज्ञा, शुभ तारिका आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। 
 लघुकथा 

दनुजनिरोषिणि


  गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही बस लगभग खाली हो चुकी थी। 
धीरे धीरे रात में ढलती सांझ और यह खाली बस!
 ड्राइवर और कंडक्टर भी शराफ़त का चोला उतारने पर आमादा थे। यह सब देख श्रेया को भय लगने लगा। अब तो उसे अकेले सफर करने के अपने ही निर्णय पर पछतावा हो रहा था। ड्राइवर और कंडेक्टर को अपनी ओर इशारा करते देख उसने कातर नज़र से अपनी एकमात्र बुज़ुर्ग महिला सहयात्री की ओर देखा। मगर वह आंटी कुछ प्रतिक्रिया देने की बजाय आंख बंद कर मोबाइल पर महिषासुरमर्दिनि का पाठ सुनने लगीं। ऐसा भी नहीं था कि उन्हें परिस्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा न हो पर शायद उन्हें प्रतिक्रिया देने के लिए अखबार की सुर्खियों का इंतज़ार था।
  एक कुत्सित मुस्कान लिए कंडक्टर श्रेया की ओर बढ़ने लगा। श्रेया सहम कर अपनी सीट छोड़ पीछे हटी मगर बस के सीमित दायरे में कितना पीछे खिसकती। पिछली सीट के नीचे से झांकती लोहे की रॉड देख कर उसके शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई। 
   ड्राइवर के कान भी पीछे ही लगे थे। शायद वह पीछे के दृश्य को कानों से पीना चाहता था मगर उसके कानों तक पहुंच रहा था-
 दनुजनिरोषिणि दुर्मदशोषिणि दुर्मुनिरोषिणि सिंधुसुते
 वह अधिक देर तक अपनी लालसा को रोक नहीं पाया और पीछे झांक कर देखा मगर पीछे का दृश्य देख उसकी आंखें फैल गई। श्रेया हाथ में लोहे की रॉड लिए खड़ी थी और कंडक्टर अपना सर पकड़े बस के फर्श पर पसरा हुआ था। और... और बुजुर्ग आंटी! वे अब भी आंखें बंद किए मुस्कुराते हुए सुन रही थी-
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते।