मंगलवार, 26 जनवरी 2021

रुबी दीदी लघुकथाकार अर्विना

लघुकथा 


रुबी दीदी‌


    रुबी दरवाजे पर बैठकर  कार्ड में पते लिख रही थी। 

गली से गुजरते हुए, कमली ने  रुबी के पास आकर पूछा "यह क्या कर रही हो ?" 

"कमली मैं अब बूढी हो चली हूं, गाना बजाना मेरे बस की बात रही नहींं। हम किन्नरों का कौन है? इस दुनियां में ऊपरवाले का कब बुलावा आ जाये इसलिए मैंने सोचा अपने जीते जी ही अपना मृत्यु भोज खुद कर लूं।" 

"दिखा तो कैसा कार्ड छपवाया है? अरे! वाह कार्ड पर तुम्हारी  कितनी सुन्दर तस्वीर है।" 

 रुबी  की आँखे छलछला आई! "ये तस्वीर तो तेरे मोहल्ले में आने से बहुत पहले की है।" 

"कमली याद है तुम्हारे बेटे की बधाई भी तो मैंने ही गाई थी।"  

"हाँ दीदी सब याद है।" 

 "कमली हमारा कौन है ? जो हमारे मरने पर .... 

"रुबी दीदी  आपने कैसी बात कर दी? हम तो हैं आपके अपने।" 

"तुम्हारा बहुत बड़ा दिल है। वरना लोग तो हम  से दूरी बना कर रखते हैं। मानों हम कोई छूत के मरीज हों!"  

"रुबी दीदी हमारी और तुम्हारी शारिरिक बनावट में फर्क है! लेकिन  दिल तो हमारे एक से ही धड़कते हैं! 

    अर्विना 


शिक्षा एम एस सी वनस्पति विज्ञान

राष्ट्रीय समाचार पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित

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