रविवार, 7 फ़रवरी 2021

बाजी लघुकथाकार सविता मिश्रा "अक्षजा"

 




सविता मिश्रा "अक्षजा'

 मोबाइल ९४११४१८६२१
  
 2012.savita.mishra@gmail.com 

पता-
फ़्लैट नंबर -३०२, हिल हॉउस
खंदारी अपार्टमेंट, खंदारी
आगरा २८२००२

लघुकथा 

बाजी


         "वाह भईकलम के सिपाही भी मौजूद हैं।”  पीडब्‍ल्‍यूडी के चीफ इंजीनियर साहब ने पत्रकार पर चुटकी ली।
               "काहे के सिपाही। कलम तो आप सब के हाथ में हैंजैसे चाहे घुमाये।" पत्रकार सबकी तरफ देखता हुआ बोला।
पत्रकार भाईआजकल जलवा तो आपकी ही कलम का है। आपकी कलम चलते हीसब घूम जाते हैं। फिर तो उन्हें ऊँच-नीच कुछ नहीं समझ आता है। आपकी कलम का तोड़ खोजने के लिए जो बन पड़ता हैंवो कर गुजरते हैं।” डॉक्टर साहब व्यंग्य करते हुए बोल उठे।
              “पत्रकार बन्धुओं को तो चाय पानी देना बहुत जरुरी है। वरना न देने वाले को तो बिन पानी मछली की तरह तड़पना पड़ता है।  ” डॉक्टर की बात के समर्थन में एक पुरजोर आवाज आयी।
           गेट पर खड़ा चपरासी चुपचाप सबके लिए गेट खोलता और बंद करता।  चेहरा भावहीन था लेकिन उसके कान सजग थे।
             "सही कह रहे हो आप सब। वैसे हम सब एक ही तालाब के मगरमच्‍छ हैं। एक-दूजे का ख्याल रखें तो अच्छा होगा। वरना आजकल लोग लाठी-डंडे लेकर खोपड़ी फोड़ने पर आमदा हो जाते हैं।" लेखपाल ने बात आगे बढ़ाई।
           "परन्तु ये ताकतवर कलमहम तक नहीं पहुँच पाती है।" ठहाका मारते हुए बैंक मैनेजर बोला।
            "क्योंआप कोई दूध के धुले तो हैं नहीं!" गाँव के प्रधान ने कटाक्ष किया।
              "अरे भईकौन मूर्ख कहता है कि हम दूध के धुले हैं। पर काम ऐसा है कि जल्दी किसी को समझ नहीं आता है हमारा खेल।" फिर जोर का ठहाका ऐसे भरा जैसे इसका दम्भ था उन्हें। 

सारी नालियाँ जैसे बड़े परनाले से मिलती हैंवैसे ही विधायक महोदय के आते हीसब उनसे मिलने उनके नजदीक जा पहुँचे।
             "नेता जी! मेरे कॉलेज को मान्यता दिलवा दीजियेबड़ी मेहरबानी होगी आपकी।" कॉलेज संचालक विनती करते हुए बोला। 

             "बिल्कुलकल आ जाइये हमारे आवास पर। मिल बैठकर बात करते हैं।" विधायक जी बोले।
              "क्यों ठेकेदार साहबआप काहे छुप रहे हैंअरे मियाँयह कैसा पुल बनवायाचार दिन भी न टिक सका। इतने कम कीमत में तो मैंने तुम्हारा टेंडर पास करवा दिया थाफिर भी तुमने तो कुछ ज्यादा ही...।"
            "नेता जी ! आगे से ख्याल रखूँगा। गलती हो गयीमाफ़ करियेगा।" हाथ जोड़ते हुए ठेकेदार बोला।
          विधायक जी ठेकेदार को छोड़दूसरी तरफ मुखातिब हुए, "अरे एसएसपी साहब! आप भी थोड़ा..., सुन रहें हैं सरेआम खेल खेल रहे हैं। आप हमारा ध्यान रखेंगेतो ही तो हम आपका रख पाएंगे।" विधायक साहब उनके कान के पास बोले।
           "जी सरपर इस दंगे की तलवार सेमेरा सिर कटने से बचा लीजिए। दामन पर दाग़ नहीं लगाना चाहता। आगे से मैं आपका पूरा ख्याल रखूँगा।" साथ में डीएम साहब भी हाथ जोड़ खड़े थे।
        सुनकर नेता जी मुस्करा उठे।
            सारे लोगों से मिलने के पश्चात उनके चेहरे की चमक बढ़ गई थी। दो साल पहले तकजो अपनी छटी कक्षा में फेल होने का अफ़सोस करता था। आज अपने आगे-पीछे बड़े-बड़े पदासीन को हाथ बाँधे घूमते देखगर्व से फूला नहीं समा रहा था।
        तभी सभा-कक्ष के दरवाजे पर खड़ा हुआ चपरासी रोष पूर्वक बोल उठा, “और मैं एक किसान परिवार का बेटा हूँ। जिसकी पढ़ाई करवाते-करवाते पिता कर्जे से दबकर आत्‍महत्‍या कर बैठे।        परिवार का पेट भरने के लिए मुझे चपरासी की नौकरी करनी पड़ रही है। पर मुझे आज समझ आया कि मेरे पिता की आत्‍महत्‍या और मेरे परिवार को इस स्थिति में लाने में आप सबका हाथ है। आप सबका कच्‍चा चिठ्ठा अब मेरे पास है।
              बाजी पलट चुकी थी! विधायक से लेकर ठेकेदार तकसब एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे।