परोपकार
तेज़ गति से दौड़ती रेलगाड़ी की रफ्तार धीमी पड़ रही थी। खिड़की से बाहर देखने पर एहसास हुआ कि गाड़ी धीरे धीरे प्लैटफॉर्म पर लग रही है। बाहर होती हल्की बूंदाबांदी और शीतल बयार से जहाँ बाकी यात्रियों के चेहरे पर मुस्कान खिल रही थी वहीं नैना के माथे पर चिंता की लकीरें उभर रही थीं।
अंजान शहर, बेगाने लोग गोद में साल भर की दूधमूई बच्ची, और तीन तीन बैग! क्या करे! कैसे इस बारिश के मौसम में उतरे और जाए तो जाए कहाँ!
एक छोटी सी लापरवाही ने उसे बहुत बड़ी मुश्किल में डाल दिया था। दो मिनट के अंतर से आने वाली लखनऊ शताब्दी की जगह देहरादून शताब्दी ट्रेन में बैठना उसके लिए मुसीबत का सबब बन गया था। बहुत आग्रह करने पर भी टी टी ने चेन खींच कर गाड़ी रोकने की इजाजत नहीं दी थी। तगड़ा फाइन लेकर भी अगले स्टॉप पर उसे ट्रेन से उतरने की हिदायत देकर वह चलता बना।
डब डबाये नैन बरसने ही वाले थे कि पति अंकित का फोन आ गया। रूआँसी हो सारी घटना उसने कह सुनाई।
"चिंता मत करो! मैं कुछ करता हूँ।" कहकर पति अंकित ने फोन रख दिया।
"सुनो! मेरे एक मित्र के बड़े भाई के साले का कोई रिश्तेदार वहीं मुरादाबाद में रहता है। मैंने बात कर ली है, तुम्हें वहीं स्टेशन पर मिलेगा। चार घंटे बाद लखनऊ के लिए एक ट्रेन है उसमें तुम्हें बैठा देगा।" अंकित ने कुछ देर बाद फोन पर समझाया।
नैना को यकीन था कोई नहीं आने वाला। कोई क्यूँ बिना जान पहचान उसके लिए दौड़ता हुआ आएगा।
ट्रेन रुकी तो वो वर्तमान में लौटी, जैसे तैसे सामान उतार ही रही थी कि सामने से एक 28-29 साल का लड़का दौड़ते हुए आ गया।
" माफ कीजिए, देर हो गई! आप ही नैना हैं?"
"जी मैं ही...!" नैना आश्चर्य में थी।
"लीजिए, आप ये खाना खाइए!
ये रास्ते के लिए आपका टिफिन। ये गुड़िया के लिए थोड़ा दूध लाया था।
आप पहले तसल्ली से कुछ खा लें फिर कुछ और चाहिए तो मुझे बताइये?
आप मेरी पत्नी के साथ आराम से बैठिए तब तक मैं आपकी टिकिट ले आता हूँ। " वह कहता जा रहा था और नैना भावविभोर हो उन अजनबी फरिश्तों को देख रही थी।
देखिए अगली ट्रेन चार घंटे बाद है लेकिन आप फिक्र मत करिए हम आपके साथ रुकेंगे जब तक ट्रेन नहीं आ जाती! रात का समय है आपके लिए अकेले रहना सेफ नहीं होगा।
उसे सोच कर भी ग्लानि होने लगी," कैसे वह अंकित को दूसरों की मदद से रोकती थी और बेवकूफ़ करार देकर अक्सर झगड़ती थी।"
नैना ने उपकार के बोझ से लदी पलकों के बोझ को हल्का करते हुए दोनों अजनबी फरिश्तों को अलविदा कहा और ट्रेन में बैठ गई।
नैपथ्य में कहीं अंकित की आवाज कानों में गूँज रही थी,
परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता, ईश्वर सब देखता है।"
सोनिया निशांत कुशवाहा
एक गृहणी । स्नातक के साथ साथ इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है। पूर्व में 6 वर्षों का कार्य अनुभव भी रहा है।
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