पांच लघुकथाएं
चुनौती
रियासत में जबसे वार्षिक गायन प्रतियोगिता की घोषणा हुई थी संगीत प्रेमियों में हलचल मच गई थी। उस्ताद ज़ाकिर खान और पंडित ललित शास्त्री दोनों ही बेजोड़ गायक थे। परन्तु उनमे गहरी प्रतिद्वन्दिता थी। राष्ट्रीय संगीत आयोजन के लिए दोनों पूरे दम खम के साथ रियाज़ में जुट गए , वे दोनों ही अपने हुनर की धाक जमाने को बेकरार थे। अक्सर दोनो के चेले चपाटों के बीच सिर फुटव्वल की नौबत आ जाती। खान साहब के शागिर्द अपने उस्ताद को बेहतर बताते तो शास्त्री जी के चेले अपने गुरु को।
खान साहब जब अलाप लेते तो लोग सुध बुध खोकर उन्हें सुनते रहते, उधर शास्त्री जी के एक एक आरोह अवरोह के प्रवाह में लोग साँस रोककर उन्हें सुनते रह जाते। दोनों का रियाज़ देखकर निर्णय लेना मुश्किल हो जाता कि प्रतियोगिता का विजेता होने का गौरव किसे मिलेगा। बड़ी-बड़ी शर्ते लग रही थीं कि उनमें से विजेता कौन होगा।
शास्त्री जी की अंगुलियाँ सितार पर थिरक रही थीं, वह अपनी तान में मगन होकर सुर लहरियाँ बिखेर रहे थे । पशु पक्षी तक जैसे उन्हें सुनकर सब कुछ भूल गए थे, तभी एक चेला भागा हुआ चला आया
" गुरूजी, अब आपको कोई भी, कभी चुनौती नही दे पाएगा, आप संगीत की दुनिया के सम्राट बने रहेंगे "
" क्यों क्या हो गया ?"
" गुरु जी अभी खबर मिली है कि आज रियाज़ करते हुए खान साहब का इंतकाल हो गया " शिष्य ने बहुत उत्तेजना में भरकर बताया।
सुनकर शास्त्री जी का मुँह पलभर को आश्चर्य से खुला रह गया, फिर आँखों में अश्रु तैर गए। उन्होंने सितार उठाकर उसके नियत स्थान पर रखकर आवरण से ढंका और माँ सरस्वती को प्रणाम किया। फिर सूनी नज़रों से आसमान ताकते हुए भर्राए स्वर में कहा
" आज मेरा हौसला चला गया...अब मैं जीवन में कभी गा नहीं सकूँगा।"
लघुकथा
रोबोट
बड़े ट्रंक का सामान निकालते हुए शिखा ने बड़े ममत्व से अपने पुत्र राहुल के छुटपन के वस्त्र और खिलौनों को छुआ। छोटे-छोटे झबले,स्वेटर, झुनझुने, न जाने कितनी ही चीजें उसने बड़े यत्न से अब तक सम्हालकर रखी थीं।
अरे रोबोट ! वह चिहुँक उठी। जब दो वर्ष का था बेटा, तो अमेरिका से आये बड़े भैया ने उसे ये लाकर दिया था। कई तरह के करतब दिखाता रोबोट पाकर राहुल तो निहाल हो उठा। उसमे प्राण बसने लगे थे उसके। पर शरारत का ये आलम कि कोई खिलौना बचने ही न देता था। ऐसे में इतना महँगा रोबोट बर्बाद होने देने का मन नही हुआ शिखा का । जब भी वह रोबोट से खेलता, उस समय शिखा बहुत सख्त ह उठती बेटे के साथ । आसानी से वह राहुल को खिलौना देती ही नहीं। लाखों मनुहार करने पर ही कुछ समय को वह खिलौना मिल पाता । फिर उसकी पहुँच से दूर रखने को न जाने क्या-क्या जुगत लगानी पड़ती उसे ।
शिखा के यत्नों का ही परिणाम था कि वह रोबोट अब तक सही सलामत था। राहुल तो उसे भूल भी चुका था। फिर अब तो बड़ा भी हो गया था, पूरे बारह वर्ष का। अपनी वस्तुओं को माँ के मन मुताबिक सम्हालकर भी रखने लगा था।
" अब राहुल समझदार हो गया है, आज मै उसे ये दे दूँगी। बहुत खुश हो जाएगा , उसका अब तक का सबसे प्रिय खिलौना । " स्वगत भाषण करते हुए उसकी ऑंखें ख़ुशी से चमक रही थीं।
तभी राहुल ने कक्ष में प्रवेश किया।
" देख बेटा ,मेरे पास क्या है ?" उसने राजदाराना अंदाज में कहा।
" क्या है माँ ?"
" ये रोबोट, अब तुम इसे अपने पास रख सकते हो । अब तो मेरा बेटा बहुत समझदार हो गया है।"
" अब इसका क्या करूँगा माँ ?" क्षण मात्र को राहुल के चेहरे पर पीड़ा के भाव उभरे, फिर मुँह फेरते हुए सख्त लहजे में बोला " मैं कोई लिटिल बेबी थोड़े ही हूँ जो रोबोट से खेलूँगा। "
लघुकथा
मिठाई
रात को सोने से पहले परेश ने घर के दरवाजो का निरीक्षण किया। आश्वस्त होकर अपने शयनकक्ष की ओर बढ़ा ही था कि तभी सदा के नास्तिक बाबूजी को उसने चुपके से पूजाघर से निकलते देखा।
"बाबूजी, इतनी रात को ... ?"
उसकी उत्सुकता जाग गई, और उसका पुलिसिया मन शंकित हो उठा। वह चुपके से उनके पीछे चल पड़ा। वे दबे पाँव अपने कमरे में चले गए, फिर उन्होंने अपना छिपाया हुआ हाथ माँ के आगे कर दिया!
" लो तुम्हारे लिये लड्डू लाया हूँ, खा लो। "
" ये कहाँ से लाए आप ?"
" पूजा घर से ।" उन्होंने निगाह चुराते हुए कहा।
" पर इस तरह ... "
" क्या करूँ, जानता नही क्या की तुम्हे बेसन के लड्डू कितने पसन्द हैं। परेश छोटा था तो हमेशा तुम अपने हिस्से का लड्डू उसे खिला दिया करती थीं। आज घर मे मिठाइयाँ भरी पड़ी हैं पर बेटे को ख्याल तक नही आया , की माँ को उसकी पसन्द की मिठाई खिला दे। "
" ऐसे मत सोचिए, उस पर जिम्मेदारियों का बोझ है, भूल गया होगा । " माँ ने उसका पक्ष लेते हुए कहा।
" तुम तो बस उसकी कमियाँ ही ढकती रहो , लो अब खा लो। "
" आप भी लीजिये न "
" नहीं, तुम खाओ, जीवनभर अपने हिस्से का दूसरों को ही देती आयीं। तुम्हे इस तरह तरसते नही देख सकता मैं ।" कहते हुए बाबूजी ने जबरन लड्डू उन्हें खिला दिया।
उसकी आँखें भर आयीं अपनी लापरवाही पर। माता पिता की भरपूर सेवा करने का उसका गुरुर चकनाचूर हो गया। घर में सौगात में आये मिठाई के डिब्बों का ढेर मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था। उसने लड्डू का डिब्बा उठाया और नम आँखें लिये माँ बाबूजी के कमरे की ओर चल दिया।
लघुकथा
कब तक ?
उसकी सूनी नज़रें कोने में लगे जाले पर टिकी हुई थीं । तभी एक कीट उस जाले की ओर बढ़ता नज़र आया। वह ध्यान से उसे घूरे जा रही थी।
" अरे ! यहाँ बैठी क्या कर रही हो ? हॉस्पिटल नही जाना क्या ?" पति ने टोका तो जैसे वह जाग पड़ी।
" सुनिए , मेरा जी चाहता है की नौकरी छोड़ दूँ । बचपन से काम कर - कर के थक गई हूँ । शरीर टूट चला है । साथी डॉक्टरों की फ्लर्ट करने की कोशिश , मरीज और उनके तीमारदारों की भूखी निगाह , तो कभी हेय दृष्टि , अब बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया है । " आशिमा ने याचना भरी दृष्टि से पति को ताका।
" पागल हो गई हो क्या ? बढ़ते बच्चो के पढ़ाई के खर्चे, फ्लैट और गाड़ी की किस्तें । ये सब कैसे पूरे होंगे ? "
" मुझे बहुत बुरा लगता है जब डबल मीनिंग वाले मजाक करते हैं ये लोग। इन सबकी भूखी नज़रें जब अपने शरीर पर जमी देखती हूँ तो घिन आती है । "
" हद है आशिमा, अच्छी भली सरकारी नौकरी है। जिला अस्पताल में स्टाफ नर्स हो। अभी कितने साल बाकि हैं नौकरी को । तुम्हारे दिमाग में ये फ़ितूर आया कहाँ से ? थोडा बर्दाश्त करना भी सीखो । " झिड़कते स्वर में पति ने जवाब दिया।
" चलो उठो,आज मैं तुम्हे ड्रॉप करके आता हूँ " उन्होंने गाड़ी की चाभी उठाते हुए कहा। आशिमा की निगाह जाले की ओर गई तो देखा वह कीट जाले में फंसा फड़फड़ा रहा है और खूंखार दृष्टि जमाए एक मकड़ी उसकी ओर बढ़ रही है।
" नहीं " वह हौले से बुदबुदाई, फिर उसने आहिस्ता से जाला साफ करने वाला उठाया और उस जाले का अस्तित्व समाप्त कर दिया।
लघुकथा
मुफ़्त शिविर
छोटे-छोटे बच्चे,दो वक़्त की रोटी जुटाने की मशक्कत,और बिटिया की जान पर मंडराता खतरा देखकर परमेसर सिहर उठा। अंततः उसने अपनी एक किडनी देकर बेटी के जीवन को बचाने का संकल्प कर लिया।
" तुम तो पहले ही अपनी एक किडनी निकलवा चुके हो,तो अब क्या मजाक करने आये हो यहाँ ?" डॉक्टर ने रुष्ट होकर कहा।
" जे का बोल रै हैं डागदर साब,हम भला काहे अपनी किटनी निकलवाएंगे। ऊ तो हमार बिटिया की जान पर बन आई है।छोटे-छोटे लरिका हैं ऊ के सो हमन नै सोची की एक किटनी उका दे दै।"
" पर तुम्हारी तो अब एक ही किडनी है, ये देखो ऑपरेशन के निशान भी हैं "
" अरे ऊ कौनौ किटनी न निकलवाई हमने।ऊ तो मुला नसबन्दी का आपरेसन हुआ था।" वह डॉक्टर की मूर्खता पर ठठाकर हँस पड़ा ।
" ऊ जा साल सूखा पड़ा था,तबहीं एक सिविर लगा था। सबका मुफत में नसबन्दी का आपरेसन करके हज्जार रुपैया ,एक कम्बल ,अउर इशट्टील का खाने का डब्बा दै रै थे। तबहिं हमन नै आपरेसन करवा के हज्जार रुपैय्या अपनी अन्टी में ....." कहते कहते वह रुक गया। और उसकी आँखें भय से फैल गईं।
नाम - ज्योत्स्ना ' कपिल '
जन्म - 2 अगस्त , लखनऊ
शिक्षा - स्नातकोत्तर ( अंग्रेजी साहित्य ), बी. एड.
व्यवसाय - कई वर्ष तक पब्लिक स्कूल में शिक्षण कार्य ।
सम्प्रति - स्वतन्त्र लेखन।
विधाएं - छंदमुक्त कविताएं, कहानी, उपन्यास, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, समीक्षा, डायरी
प्रकाशन - विभिन्न प्रतिष्ठित ,साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में लेख, कहानी,कविता और लघुकथाओं का प्रकाशन ( चम्पक, साहित्य अमृत, सरस्वती सुमन, हिंदी चेतना, मिन्नी, संरचना,अविराम साहित्यिकी , प्रेरणा अंशु, खुशबू मेरे देश की, वी विटनेस, सत्य की मशाल, दृष्टि, लघुकथा कलश,अमर उजाला , दैनिक जागरण इत्यादि । )
वेबसाइट - पुरवाई, लघुकथा डॉट कॉम, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, प्रतिलिपि, मातृभारती , सेतु।
प्रसारण - आकाशवाणी बरेली के द्वारा कहानी व लघुकथाओं का प्रसारण।
संकलन - बून्द बून्द सागर, लघुकथा अनवरत, नई सदी की धमक, सपने बुनते हुए, अपने अपने क्षितिज, नई सदी की लघुकथाएँ , चुनींदा लघुकथाएँ, कविता अभिराम।
कहानी संग्रह - प्यासी नदी बहती रही 2017
लघुकथा संग्रह - लिखी हुई इबारत 2019
सम्पादन - ' आस पास से गुजरते हुए ' लघुकथा संकलन (2018), समकालीन प्रेम विषयक लघुकथाएं ( 2019)।
त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ' अविराम साहित्यिकी ' में सहसंपादक ।
सम्मान - नारी अभिव्यक्ति मंच पहचान द्वारा ' शकुंतला कपूर स्मृति लघुकथा सम्मान ', हिंदी विभाग बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झाँसी एवम अखिल भारतीय साहित्य परिषद के सँयुक्त तत्वावधान में रवींद्र फाउंडेशन द्वारा ' डॉ माधुरी शुक्ला स्मृति कथा साहित्य पुरस्कार' , हरियाणा प्रादेशिक लघुकथा मंच गुरुग्राम द्वारा ' लघुकथा शिरोमणि सम्मान ' , प्रेरणा अंशु- अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता सम्मान, भारतीय पत्रकारिता संस्थान, मानव सेवा क्लब द्वारा ' शांति सुरेंद्र स्मृति साहित्य सम्मान ' , दीपशिखा साहित्यिक एवम सांस्कृतिक मंच द्वारा ' ज्ञानोदय अकादमी दीपशिखा सम्मान'। के. बी. हिंदी साहित्य समिति द्वारा ' शशिप्रभा शास्त्री स्मृति पुरस्कार '।
सम्पर्क - ज्योत्स्ना सिंह, 18 - ए , विक्रमादित्य पुरी, स्टेट बैंक कॉलोनी, बरेली - 243005
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