लघुकथा
और अस्तित्व बच गया
डॉ. योगेंद्र नाथ शुक्ल
“शहर के जितने भी राजघराने के स्थल थे, वह सारे के सारे बिक गए। ईश्वर की कृपा हम पर हो गई ,इसलिए हम बिकते बिकते बच गए।"
“तुम सच कह रही हो बहना! इन लोगों ने तो अपने वंशज दानवीर, पराक्रमी राजाओं की शान में बट्टा ही लगा दिया!”
“उन्होंने महल बेचे, उसका दुख नहीं परंतु इन्होंने तो अपनी प्राचीन धरोहरों को ही बेच दिया।"
“ बहना! यह एहसानफरामोश जानते ही नहीं की खिदमत से ही अजमत है।"
“सच कहा तुमने,इनके पूर्वजों ने जनता के लिए मंदिर बनवाए…मस्जिद बनवाई… धर्मशालाएं बनवाई… और एक यह हैं कि अपनी अय्याशियों के लिए इन्होंने जमीनों के साथ-साथ उन्हें भी बेच दिया।“
“बहना! भले ही हमें रियासत के जमाने की छतरियों के नाम से जाना जाता है पर है तो हम मकबरे… यदि हम मकबरे नहीं होते तो यह नामाकूल हमें भी बेच देते!”
अपना अस्तित्व सुरक्षित हो जाने के कारण ,वे सब आज बहुत खुश थीं, इसलिए उनके दिल की बातें बाहर आती जा रहीं थी।
संप्रति- प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष (हिंदी)
निर्भय सिंह पटेल शासकीय विज्ञान महाविद्यालय, इंदौर (मध्य प्रदेश)
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