मंगलवार, 11 मई 2021

सोनिया निशांत कुशवाहा


लघुकथा 

मर्दानगी 


            ऑफिस का काम खत्म करते करते आज फिर मुझे एक घंटा अधिक लग गया था। गर्भावस्था का पाँचवाँ महीना, तन और मन कुछ निढाल सा जो रहने लगा है। जैसे तैसे कदमों को धकेलते बसअड्डे पहुँची। अक्टूबर महीने की गुलाबी ठंड में शाम के साढ़े छह बजे ही गहरा धुंधलका छा गया था।
                बस का इंतज़ार कर ही रही थी कि एक कर्कश सी ध्वनि मेरे कानों में गूंजी!
मर्दाना डील डौल, गहरे रंग की लाली, अश्लील तरीके से लिपटी साड़ी और भूरे रंगे हुए बाल! उन किन्नरों को देख मेरे भीतर अजीब सी सिहरन दौड़ गई। बात घृणा की नहीं है लेकिन बचपन से ही किन्नरों को देख मुझे खौफ महसूस होता था।
             मैंने थोड़ा असहज होकर उनसे कुछ दूरी बना ली। आसपास कुछ गिने चुने लोग और खड़े थे जो बस के लिए प्रतीक्षारत थे। तभी तीन चार मनचले आकर मुझसे बिल्कुल चिपक कर खड़े हो गए।रात के अंधेरे और अकेली महिला का फायदा उठाते हुए, वो कभी हाथ छू देते तो कभी अश्लील फबतियाँ कसते। ठंडी शाम में भी पसीने की बूँदे मेरे कान को गीला कर रही थी। सबकुछ बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा था। साथ खड़े एक सज्जन से दिखने वाले पुरुष से मदद माँगने की कोशिश की लेकिन उसने मानो आँख और कान पर पट्टी बांधी हुई थी।
          पानी सर से ऊपर बह रहा था, घुटन से आँसू छलकने ही वाले थे कि पास खड़े किन्नरों ने उन मनचलों को घेर लिया और ताली पीट पीट कर उन्हें जलील करने लगे। 
            नामर्दों पर मर्दानगी हावी हो गई थी।
         मर्दों की उपस्थिति में स्वयं को सुरक्षित महसूस करते ही वातावरण की ठंडक मेरे दिल तक पहुँच कर चेहरे पर मुस्कान ले आई थी। 


सोनिया निशांत कुशवाहा 
फतेहपुर उत्तरप्रदेश