दिल को मथने वाला बहुत ही मार्मिक वाक़या लेखिका ने प्रस्तुत किया है। पढ़िए-
संस्मरण
क्षमा याचना
मैंने कहा, "रुको, मैं अभी चैक करती हूँ।" मैंने झट वहाँ सड़क पर बिछी कंकरीट में से एक कंकड़ उठाकर उसके कटोरे में डाल दिया। तब तक मेरे पापा भी हमारे पीछे-पीछे वहाँ पहुँच चुके थे। उन्होंने बिना कुछ कहे, मगर कसकर आँख दिखाई कि मैं भीतर तक सहम गयी और मुझे फौरन अपनी गलती का अहसास हो गया। मैंने झट कटोरे में से कंकड़ वापस उठा लिया।
वो दिन और आज का दिन, जब भी मैं किसी भिखारी को भीख माँगते देखती हूँ, वो वाक़या मेरी आँखों के सामने जीवंत हो उठता है और मैं आत्मग्लानि से भर उठती हूँ। सोचती हूँ कि काश! उसी वक्त मैंने उससे माफी माँग ली होती। जैसा कि बचपन से ही हम सभी बच्चों को घर में सिखाया गया था कि गलती हो जाने पर फौरन क्षमा माँगनी चाहिए। कभी सोचती हूँ कि कंकड़ तो मैंने वापस उठा ही लिया था तो क्या भिखारी ने मुझे माफ न कर दिया होगा? वह जरूर आस-पास के गाँव का रहने वाला होगा और अपनी जरूरत पूरी करने के लिए वहाँ भीख माँगने आ जाया करता होगा। इस तरह के प्रश्न मुझे अक्सर बेचैन कर देते हैं। सुना है, जिसे हम दिल से याद करते हैं, मन के भाव तरंगित हो उस तक पहुँच जाते हैं। काश कि मेरी प्रार्थना भी उस तक पहुँच गयी हो ...।
प्रेरणा गुप्ता - कानपुर
