सोमवार, 7 जून 2021

 



लघुकथा 

******* नीला गुलाब ***** 


        विजेता, वीरेंद्र के बगल वाली सीट पर आकर बैठी, वीरेंद्र ने गाडी स्टार्ट की और चल पड़ी होटल मधु विहार! वीरेंद्र गुन गुना रहा था, ये शाम मस्तानी .......

      विजेता मंद - मंद मुस्करा रही थी !

पार्टी पुरे शबाब पर थी, रात के ११ बज चुके थे! विजेता ने कहा : वीरेन्द चलो अब घर! आज पहली बार विजेता को वीरेंद्र ऐसी पार्टी में लाया था! वे दोनो बाहर आकर कार में बैठ गए! विजेता ने अपना पर्स पीछेवाली सीट पर उछाल दिया! उसमे रखा नीला गुलाब का फूल भी बाहर उछल पड़ा और मुस्कराने लगा! 

      वीरेंद्र की नजर उस पर पड़ी!

      वीरेंद्र ने पूछा : विजेता ये नीला गुलाब तुम्हारे पास कैसे आया! 

      ये मुझे आपके परिचित मनीष ने दिया है! विजेता ने सहज कहा!

        वीरेंद्र का पारावार नहीं रहा ! तू भी हराम ......... ! उसने दिया, और तुमने ले के रखा लिया ? फेक देती उसके मुंह पर!

   देख लूंगा उस साले मनीष को भी! 

    अब सिर्फ कार की आवाज आ रही थी! 15 मिनिट बाद कार पोर्च में शांत हुई! वे दोनों फ्लेट में दाखिल हुए! 

      विजेता बड़ बड़ाई : "अब मेरी क्या गलती है!" 

       वीरेंद्र के कानो में पारा घुल गया! उसका हाथ लहराया, विजेता के शरीर पर पड़ने ही वाला था कि न जाने कहा से विजेता के हाथो में बल आ गया और उसने कस कर वीरेंद्र का हाथ पकड़ा और पूरी ताकत से उसे दूर धकेल दिया। 

        पास में पड़े स्टूल पर वीरेंद्र जा कर बैठ गया!

        कमरा नीले गुलाब कि खुशबु से महक रहा था!


* उदय श्री. ताम्हणे