मंगलवार, 8 जून 2021

मेरी पसंदीदा लघुकथा (01) संतोष सुपेकर

    



        उक्त शृंखला के अंतर्गत सर्द जवाब (संतोष सुपेकर) मे लेखक ने ठंड और गर्म वातावरण तथा शीर्षक सर्द जवाब का बहुत अच्छा कॉम्बिनेशन प्रस्तुत किया है। 

           संतू  (श्यामसुंदर अग्रवाल) मे लेखक ने जीवन मे आने वाले उतार-चढ़ाव को कलात्मक रूप मे प्रस्तुत किया है। 

पढ़िए  इनकी बेहतरीन लघुकथाएँ। 

लघुकथा 

सर्द जवाब 

संतोष सुपेकर

              "अरे-अरे-अरे.... पकड़ो-पकड़ो-पकड़ो
अलसुबह मुहल्ले में हल्ला मच गया, "क्या हुआ, क्या हुआ" की आवाज़ें चारों तरफ से आने लगीं, भीड़ इकट्ठी हो गई और कड़ाके की सर्दी में भी वातावरण गर्मा गया।

       "अरे एक बच्चा .... साला,   कोई दस बारह साल का था, मा..... अपने धर्मस्थल का झंडा उतारकर भाग गया, कुत्ता कहीं का...."

            "ऐं?" सुनकर लोग सकते में आ गए, "झंडा उतारकर भाग गया?पवित्र स्थान का झंडा उतारकर?"

      "हाँ, जरूर ये दूसरे धरम वालों की साज़िश होगी।"

          "उन्होंने झंडा उतरवाया है न! "कोई रोष में बोला, "हम उनकी इज़्ज़त उतार देंगे, उनकी... उनकी बस्तियां जला देंगे।"

         "करेंगे-करेंगे, वो भी करेंगे, पहले उस छोकरे को तो पकड़ के लाओ, काट डालेंगे साले को।"

           "अरे कोई गया क्या उसे पकड़ने?"

        "गया था न मैं" उस छोकरे के पीछे गया छोटू तभी, हांफता-हांफता आकर बोला, "भागते-भागते उसके पास तक पंहुँच गया था, पर तभी मेरा पाँव फिसला और वो गायब हो गया। पर हाँ, ये उसने फटा झंडा हाथ फैलाकर लहराया, "ये झंडा छीन लाया मैं उससे।"

           "अब्बे" एक बुजुर्ग शायद सर्दी से या गुस्से से दाँत किटकिटाते बोले, "वो जरा सा लौंडा हाथ कैसे नही आया तेरे? अरे! उसके पास तक पंहुँच गया था तो उसकी कमीज़ में, कमीज़ के कॉलर में हाथ डालकर खींच लाता साले को, बेवकूफ कहीं का..."

          "कमीज़ कहाँ थी उसके शरीर पर? इतनी सर्दी में भी" नम आँखों और पछतावे भरे स्वर में छोटू ने जवाब दिया, "यही झंडा तो ओढ़ रखा था उसने अपने खुले बदन पर!" 
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लेखक का कथन 
            
      उक्त लघुकथा  केवल सम्प्रदायवाद पर चोट नही है। वरन जल्दबाज़ी और हड़बड़ी में गलत फैसले लेने वालों पर भी चुटकी है। यह लघुकथा मुझे इसलिए भी पसन्द है, क्योंकि इसमे घोर गरीबी , साम्प्रदायवाद पर कसकर तमाचा मारती है और इसकी पंचलाइन  'यही झंडा तो ओढ़ रखा था उसने अपने खुले बदन पर'  बहुत बेहतर बन पड़ी है।
       'क्या हुआ-क्या हुआ की आवाजें चारों तरफ से आने लगीं और कड़ाके की सर्दी में भी वातावरण गरमा गया।  
          'एक बुजुर्ग शायद सर्दी से या गुस्से से दाँत किटकिटाते बोले' जैसे वाक्यों से मैने इस रचना का  भाषाई श्रृंगार किया है। 
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प्रकाशन 
      यह रचना कथादेश, नई दिल्ली की अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता, 2019 में पुरस्कृत हुई थी। मासिक कथादेश पत्रिका, नई दिल्ली के नवम्बर , 2020 अंक में प्रकाशित हुई थी।
       

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   मेरी पसंदीदा अन्य लेखक की लघुकथा 

संतू 
                                 
श्यामसुंदर अग्रवाल 

        प्रौढ़ उम्र का सीधा-सा संतू बेनाप के बूट डाले पानी की बाल्टी उठा जब सीढ़ियां चढ़ने लगा तो मैंने उसे सचेत किया," ध्यान से चढ़ना! सीढ़ियों में कई जगह से ईंटें निकली हुई हैं। गिर न पड़ना।"
      "चिन्ता न करो जी! मैं तो पचास किलो आटे की बोरी उठाकर सीढ़ियां चढ़ते हुए भी नही गिरता।"
        और सचमुच बड़ी-बड़ी दस बाल्टियाँ पानी की ढ़ोते हुए संतू का पैर एक बार भी नही फिसला।दो रुपये का एक नोट और चाय का एक कप संतू को थमाते हुए पत्नी ने कहा,"तू रोज आकर पानी भर दिया कर।"
      चाय की चुस्कियाँ लेते हुए संतू ने खुश होकर कहा,"रोज़ बीस रुपये बन जाते हैं पानी के !कहते हैं,अभी महीनाभर पानी नही आना नहर में।मौज हो गई अपनी तो।"
       उस दिन नहर में पानी आ गया और नल में भी।
     अगले दिन सीढ़ियां चढ़ जब संतू ने पानी के लिए बाल्टी माँगी तो पत्नी ने कहा,"अब तो जरूरत नही।रात को ऊपर नल में पानी आ गया था।"
     "नहर में पानी आ गया!"संतू ने आह भरी और लौटने के लिए सीढ़ियों की ओर कदम घसीटने लगा।कुछ क्षण बाद ही किसी के सीढ़ियों के गिरने की आवाज़ सुनाई दी।मैंने भागकर देखा,संतू आँगन में औंधे मुँह पड़ा था। 
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        वरिष्ठ लघुकथाकार श्री श्यामसुंदर अग्रवाल की  रचना  'संतू' मुझे इसलिए बहुत पसंद है क्योंकि यह लघुकथा  अत्यधिक परिश्रम से रची गयी प्रतीत होती है। मौसमी अवसरों का लाभ उठाकर निर्धन व्यक्ति किस तरह अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर लेता  है,रोजगार की निश्चिंतता कैसे उसमे जोश भर देती है, कैसे  बढ़ती  उम्र  में ताकत जुटाकर, वह  भरी हुई बाल्टियाँ उठाकर, टूटी सीढियां सफलता से रोज़ चढ़ जाता है और जब उसे रोजी बंद होने का संदेश मिलता है तो वह उन्ही टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से खाली हाथ ही गिर पड़ता है।सीढ़ियों और संवादों को प्रतीक बनाकर लेखक ने जिस तरह रचना का शिल्प गढ़ा है वह काबिले तारीफ है। लघुकथा में एक अक्षर भी अतिरिक्त नही लगता।
    रचना में 'बेनाप के बूट डाले"' वाक्यांश में  संकेत के माध्यम से कथा नायक की दरिद्रता बखान हो जाती है। वहीं 'लौटने के लिए कदम घसीटने लगा'से उसकी गहन निराशा का बोध होता है।
 
      ये लघुकथा श्री भगीरथ द्वारा सम्पादित दिशा प्रकाशन, नई दिल्ली के 'पड़ाव और पड़ताल'(श्रृंखला संयोजक श्री मधुदीप) के खण्ड -4 में प्रकाशित हुई है। 

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संतोष सुपेकर,
31,सुदामा नगर,उज्जैन
मध्यप्रदेश
9424816096