गुरुवार, 1 जुलाई 2021

लघुकथा भेद

लघुकथा 

भेद 

          किसी संस्थान से जुडे थे वे।  दान धर्म कभी व्यर्थ नही जाता समझा रहे थे। मेरी ओर से  कोई  संकेत न पाकर, उन्होंने   मुझसे स्पष्टत: मोटी रकम दान करने के लिए कहा। मैं हक्का-  बक्का रह गया। हिम्मत जुटाई और अपनी असमर्थता व्यक्त की। वे मुंह चिढ़ाते हुए चल दिए। 

        तभी  दरवाजे पर भिखारी की आवाज आई "जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला।" 



उदय श्री ताम्हणे 

भोपाल मध्यप्रदेश