लघुकथा
भेद
किसी संस्थान से जुडे थे वे। दान धर्म कभी व्यर्थ नही जाता समझा रहे थे। मेरी ओर से कोई संकेत न पाकर, उन्होंने मुझसे स्पष्टत: मोटी रकम दान करने के लिए कहा। मैं हक्का- बक्का रह गया। हिम्मत जुटाई और अपनी असमर्थता व्यक्त की। वे मुंह चिढ़ाते हुए चल दिए।
तभी दरवाजे पर भिखारी की आवाज आई "जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला।"
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
