आदर्श महिला
कार्यालय में जाने-आने हेतु निर्धारित बस है। वह अक्सर प्रस्थान बिंदु पर ही भर जाती है। कुछ सवारियों को तो वहीं से खड़े-खड़े यात्रा करना पड़ती है। बस में आगे की सीटें नियमानुसार महिलाओं के लिए आरक्षित रहती हैं। कार्यालय जाने वालों में महिलाओं की अधिकता होने के कारण पीछे की सीटों पर भी प्राय: उनका ही वर्चस्व होता है। जाते समय, जिस स्टॉप से विभूति जी बस में सवार होते हैं, वहाँ पहुँचने तक उसमें कुछ ही सीटें खाली बचती हैं । एक सीट चुनकर वे उस पर बैठ जाते हैं । किन्तु जब एक ही सीट खाली होती है तो वे नहीं बैठते हैं। छोड़ देते हैं; क्योंकि वे जानते हैं कि आगे आने वाले स्टॉप पर निश्चित ही सवाँरियाँ चढ़ेंगी और उनमें महिलायें भी होंगी। कई बार महिलायें अपनी सहेली के लिए जगह रोककर भी रखती हैं !
"भाईसाहब, बैठ जाइये यहाँ सीट खाली है।"
महिला की आवाज सुनकर वे पलटकर देखते हैं। संभ्रात महिला अपनी बगल वाली सीट की ओर इशारा करती है।
"रहने दीजिये…" वे कहते हैं, "मैं खड़ा रहता हूँ। कोई महिला आ गई तो…"
"जी, नहीं।" वह दृढ़ स्वर में बोली, "जो आपके बाद आएगा, खड़ा रहेगा। आप बुजुर्ग हैं, पहले आये हैं, बैठिये।"
इन्सानियत के पक्ष में आया उसका स्वर उन्हें सीट पर बैठ जाने की हिम्मत दे देता है।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
