लघुकथा
तृप्त कामना
उसने अपना सब कुछ छोड़ दिया था, प्यार पाने के लिए । परिवार - रिश्तेदार यहां तक की धन - वैभव भी उससे विदा हो रहे थे। लेकिन प्यार कहीं छुपा हुआ था। लाजवंती में कामिनी में रीटा में कही नही मिला। वह अभिषप्त जीवन जी रहा था।
घर से बाहर निकलने की भी अब उसकी इच्छा न होती थी। सामने वाले फ्लैट में रहने वाली सुनिती उसकी गतिविघियों से वाकिफ थी।
उसका सारा शरीर तप रहा था। लेकिन वह ताप ज्वर का था। सुनिती देखते ही उसकी पीड़ा जान गई। वह बोली - "सर जी ! आप की इजाजत हो तो मैं आपके कामकाज में सहयोग करु?"
उसने कहा- " हाँ! जरूर सुनिती।"
सुनिती सुबह शाम उसकी देखभाल करने लगी।
नि:स्वार्थ प्यार उजागर हुआ। उसे प्यार का अर्थ मिल गया था।
उदय श्री ताम्हणे
भोपाल मध्यप्रदेश
