शनिवार, 21 अगस्त 2021

कहानी बेबसी ( सुरेंद्र कुमार अरोड़ा )






कहानी                                         

                                                        

 बेबसी 


         उसने  कहा ," मैं तुम्हें छूना चाहता हूं ।"

      " मना किसने किया है , लो छू लो ।" मैं बोली ।

   उसने हाथ आगे बढ़ा दिया । उसके हाथ हवा में हिलते रह गए । वो मुझे छू नहीं पाया तो उसकी आँखें मायूस हो गयीं। 

मैने पूछा ," क्या हुआ ? उदास क्यों हो ? "

      " हाथ तो  हवा में सिर्फ तैर कर रह गए । तुम्हें छू नहीं पाये ।" उसके शब्दों में निराशा घुली हुई थी ।

मुझे हँसी आ गई । 

     " तुम हँस रही हो ? " वो हैरानी में खोकर अपनी बात कही। 

मैं बोली , " तुम हवा को  छूने की कोशिश कर रहे हो ,वो तो  महसूस करने की चीज होती है ,उसे  कोई छू सका है क्या ? तुम्हारी नादानी पर  मैं हँसू नहीं तो और क्या करूँ ।" 

       " तुम क्या  हवा हो  जो मैं तुम्हें छू  नहीं सकता ? " उसके शब्दों में  उदासी थोड़ी और गहरा गई ।

       " तुम ही तो कहा करते हो कि मुझमें तुम्हें अपने जीवन का एहसास होता है । हवा  ही तो जीवन के  अस्तित्व की पहली सीढ़ी है ,तो क्या तुम  मुझे हवा नहीं मान सकते ? जिसे छुआ नहीं जा सकता , सिर्फ महसूस किया जा सकता है । " उसकी बेबसी पर मैं मुस्कुरा रही थी।

    वो मेरी वाकपटुता पर तो पहले ही फ़िदा था , मुझे बहुत देर तक अपनी बेबस  मुस्कान से देखने के बाद बोला , "  मुट्ठियां बंद हों ,तब भी वे  खाली रह सकती हैं , इस बात का पता तो आज ही चला । "

 मेरी हंसीं और अधिक खिल गयी। मुझे उस पर तरस आया क्योंकि वो भले ही उदास था पर  मजबूर मैं भी कम नहीं थी ।"  

इतना लिखने के बाद आख्या , अंकित की तरफ पूरे उत्साह से देखते हुए बोली , " देखो मैंने कितना सही लिखा है ! यही होती  है न प्यार की कश्मकश और उसकी खट्टी - मीठी  नोकझोंक में । "

        " पूरी हो गयी तुम्हारी बात ? " अंकित ने कहा।  

         " अभी कहाँ ? प्यार की बात पूरी हो जाए तो फिर प्यार कैसा ? फिर यहाँ तो अभी प्यार शुरू हुआ है , क्या पता आगे क्या हो। दुनिया तो पल - पल बदलती है , प्यार उससे अलग  तो है नहीं। " आख्या  का लेखक बोल पड़ा। 

        " तो  पहले वो लिख लो ,जो लिखना चाहती हो । बस एक बात  समझ  लो ,  हर प्रेम कहानी , सुखांत नहीं होती और जिसका अंत सुखांत  हो ,वो प्रेम कहानी  नहीं होती क्योंकि प्रेम जिस समर्पण की बुनियाद पर परवान चढ़ता है ,उसमें खुशिओं की हरियाली कम और दर्द के पतझड़ अधिक होते हैं। इस संसार में  लोग  दुश्मनी में इतने नहीं मरते , जितने प्यार में अपनी जान देते या लेते हैं।“  

         " ये क्या बात हुई ,प्रेमी जोड़ो की आपस में शादी नहीं होती क्या ? और होती है तो क्या वे सभी मर जाते हैं ? "

         " जो किस्मत वाले होते हैं उनकी  अक्सर  नहीं होती और जिनकी हो जाती है , शादी के बाद या तो मर - मर कर जीते हैं या फिर तलाक भी तो उन्हीं के होते हैं। "

          " क्या सभी के ? "

          " जिनके नहीं होते , वे सिर्फ निबाहते हैं , घिसट - घसट कर संबंधों को ढोते हैं। और उनमें से कोई भी बहुत अधिक दिलेर हुआ या फिर पूरी तरह से कायर , तो बसी हुई गृहस्थी  को छोड़ कर चले जाना उसकी मज़बूरी बन जाती है। "

        " तुम तो मुझे डरा रहे हो। लगे हाथ ये भी बता दो कि  उनके बच्चों का क्या होता है  अगर वे  हुए तो ? "

          " तब की बात और है ,पर आज के माहौल में  अहंकार तो दोनों तरफ से  हावी रहता ही है जिंदगी भरऔर बेचारे बच्चे भी  कई बार  पिसते हैं उनके अहंकार के पाटों के बीच।  "

         " तुम्हारे हिसाब से तब तो  किसी को किसी से  तो प्यार करना ही नहीं  चाहिएऔर कर भी ले तो उनकी  शादी हरगिज नहीं होनी  चाहिए , जिंदगी तभी सुखी रह सकती है , यही न।  " 

          " मैं यह तो नहीं कहता कि  कभी भी  किसी से ,कोई प्यार ही न करे , क्योंकि प्यार जिंदगी को जिंदगी में बदलने  की पहली जरुरत है। प्रेम , प्रकृति के हर जीव की मूलभूत आवश्कता है , जीवन की निरंतरता का आधार ही प्रेम है , प्रेम न होता तो संतति की निरंतरता भी न होती। प्रेम तो वनस्पतियां भी करती हैं , तभी तो साल दर साल प्रकृति के हर छोर पर फूल महकते हैं , हरियाली चहकती है , फसलों और वनस्पतिओं से चारो तरफ बहार आती है ,  मन  मयूर बनकर तभी  नाचता है ,जब किसी से प्यार हो जाता है । "

         " तुम तो हर बात पर कविताएं करने लगते हो। विषय से दूर होते तुम्हें देर नहीं लगती। आखिर तुम्हारी बात का मतलब क्या निकालूं  ? "

        " कुछ खास नहीं  ,मैं तो इतना जानता हूँ कि प्यार में भले ही कितने ही खतरे हों पर प्यार इस धरती पर जो कुछ भी है ,उसकी पहली जरुरत है।  गहराई से विचार करें तो जड़ पदार्थ भी अपना अस्तित्व प्रेम के बल पर ही स्थिर रख पाते हैं। जड़ पदार्थो का स्वरूप और रचना उनके कणों के  बीच  तरह - तरह की फोर्सेज के कारण ही सम्भव हो पाती  हैं । जैसे ही उनके बीच के  आबंध किसी भी कारण से  हल्के पड़ जाते हैं , उनका स्वरूप बदलते देर नहीं लगती।  कई बार तो उनका अस्तित्व ही  समाप्त हो जाता है ।  उनके अवयवों के बीच के आकर्षण को विज्ञान में एफिनिटी कहा जाता है । इसी एफिनिटी या परस्पर आकर्षण  के कारण वे निर्जीव  पदार्थ अपने अस्तित्व को स्थिर रख पाते हैं । इसलिए किसी भी संबंध के स्थायित्व  के लिए प्रेम आवश्यक है। " अंकित न जाने किस आवेश में था। 

       " लगता है आज कोई ऐसा ग्रंथ पढ़कर आये हो जिसमे सिर्फ प्रेम की ही चर्चा थी। "

       " जरुरी नहीं है कि पहले पढूं फिर कुछ कहूं। " 

       "  तो फिर समस्या कहाँ है , मुझे तो ये बताओ। " आख्या टेबल से उठ कर , उसके पास आकर खड़ी हो गयी। 

       " समस्या है भी और नहीं भी। वो अगर ,उसे छूने का ख्याल अपने मन से निकाल दे तो उसकी तृष्णा को पर नहीं मिलेंगें और वह उसमें ही अपने प्यार की पूर्णता का एहसास पा लेगा जितना उसे मिल रहा है। "

       " ये भी तो हो सकता है कि वही चाहती हो कि वह उसे  स्पर्श करे। तब क्या होगा ? " 

        " सहमति ही तो आबंध को ऊर्जा देती है , तब संबंध स्थाई हो भी सकता है पर इसमें खतरा एक है कि दोनों को  कब तक आबंध को स्थिर रखने की ऊर्जा मिलती रहेगी और  उसका स्रोत क्या होगा ? " 

        " मतलब  दोनों को ही बहुत कुछ सहना भी है और समझना भी है। "

         " हाँ ! उन्हें एक दूसरे को समझने  ही नहीं सहने के लिए भी तैयार रहने की आदत डालनी होगी।  आज की भागती - दौड़ती खुली हुई दुनियां में यही नहीं हो पाता।वे एक - दूसरे को समझ भले ही जाएँ पर सह नहीं पाते। अब व्यक्ति के प्रति लगाव की जगह  अंदर का अह्म ज्यादा मायने रखता है। जिसकी वजह से  एफिनिटी के आबंध कमजोर पड़ जाते हैं, उनके बीच की  ऊर्जा निस्तेज हो जाती है। "

       " और वही आबंधों के टूटने की वजह बन जाता है। "

      " हाँ , ठीक समझीं तुम। " 

      " इसका कोई हल तो ढूँढना पड़ेगा न , नहीं तो सारी  सामाजिक व्यवस्था ही चरमरा जाएगी।  " आख्या चिंतित नजर आयी। 

       " हाँ , ईश्वर की बनाई  इस धरती और उसके क्रियाकलापों में जटिलताएं  हैं तो उनके निदान के तरीके भी हैं। "

       " एक साथ दो - दो बातें कहकर मुझे कंफ्यूस मत करो।" आख्या उद्विग्न हो उठी।  

       " देखो ! ये जिंदगी कभी - कभी बड़ी रहस्यमय नजर आती  है तो अक्सर बड़ी सरल और सपाट भी बन जाती है। "

      " फिर वही पहेलियाँ ? पहले उलझा  देते हो , फिर लगता है जैसे सब कुछ ठीक - ठाक है। " 

       " तुम्हारी  कहानी का नायक अपनी प्रेमिका को प्यार करता है और उसे पाना चाहता है , यह वह अपनी थोपी हुई जिद के कारण नहीं करता । ऐसा किसी विधि के विधान की वजह से करता है ।क्योंकि विधि का विधान या नियति का लिखा न होता तो उन दोनों का संपर्क ही न होता , संपर्क भी ऐसा कि वे एक दूसरे को स्वीकार तो करते हैं पर  वे दोनों कभी मिल नहीं सकते ,  एक दूसरे के बारे में सोचते जरूर हैं पर जानते हैं कि उनके प्यार का भविष्य स्थूलता में कहीं है ही नहीं। नायक उसे  उसे छूना चाहता है पर छू नहीं पाता । ये भी जिंदगी कि सच्चाई है कि  जिंदगी में  ढेर सारी ऐसी बातें या घटनाएं ऐसी  हो जाती हैं जिनसे हम न चाहते हुए भी  उसके पात्र बन जाते हैं । जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे भी होते  हैं जिन्हें हम कितना ही झुठला लें ,पर वे होते हैं और उन्हें निबाहना हमारी मजबूरी होती है  , कभी - कभी दिल की और अक्सर दुनियावी रिवाजों की। "

वो आत्म मुग्ध सी  अंकित के कथन में अपनी अधूरी कहानी के पात्र को ढूंढ रही थी। अंकित बोले जा रहा था। 

        " मैं अक्सर कहा करता हूं , जो कुछ जब भी या जैसे भी घटित हो जाता है , अगले ही पल  वही  इतिहास बन जाता है और इतिहास कभी बदला नहीं जा सकता । "

        " क्या किसी के प्यार में डूब जाना भी ऐसा ही कोई पल होता है , जो इतिहास के पन्नो पर अंकित होने के लिए जिंदगी में किसी बुलबुले की तरह आता है ? " आख्या खुद को  बीच में बोलने से रोक नहीं पायी।   

        " हमेशा ऐसा होता हो , यह तो मैं नहीं कहूंगां पर लगभग हर प्यार का परीक्षण  यथार्थ की कठोर धरती पर  होता है , यह मैं जरूर मानता हूँ।"  अंकित के मुहं से जब यह कड़वी सी बात निकली  तो आख्या से रहा नहीं गया, उसके चेहरे पर थोड़ा तीखापन आ गया।  वह बोली , 

        " अंकित ! तुम बड़े निष्ठुर हो।  एक तरफ कहते प्यार जिंदगी को जिंदगी कहलाने की पहली जरुरत है और दूसरी तरफ इसकी स्थिरता को नकारते भी हो। मुझे लगता है ,तुम खुद ही प्यार को लेकर कंफ्यूस हो। "

    " तुम्हारे लिए मैं तुम्हारी बात की  हाँ में हाँ मिला सकता हूँ पर तुम्हारे सामने प्यार करने वालों  के  कुछ मशहूर  किस्से याद करके ही सहम जाता हूँ कि अगर उन होनहारों ने प्यार करने  की गलती न की होती तो एक अनाम ही सही पर अपनी पूरी जिंदगी तो जी लेते। "  

      " मुझे नहीं सुनने , वे सारे किस्से ,जिनका अंत इतना दुखदायी था।  क्या पता वे मशहूर ही इसलिए हुए हों कि उनका प्यार असफल रहा।  ऐसे मामलों में लोगों की दिलचस्पी तभी जगती है जब दूसरे खुश न रह पाएं।  दूसरों की खुशनुमा जिंदगी से तो लोग बिना वजह ईर्ष्या ही करते हैं। " 

आख्या की इस सोच पर ,अंकित किसी प्रकार का प्रहार करने के मूड में नहीं था। वह स्नेहमयी  मुस्कुराहट के साथ आख्या को देखने लगा।  आख्या भी उसके अपनत्व में कुछ देर तक खोयी रही। अंकित की मुस्कुराहट में धीरे - धीरे शरारत सामने लगी। आख्या शायद उसकी मंशा को समझ गयी। दोनों चुप रहते तो उनकी चुप्पी किसी  अनहोनी में बदल  सकती थी।  आख्या ,इसके लिए तैयार नहीं थी।  उसने बातों के सिलसिले को जारी रखना ठीक समझा।  

         " उन पुराने किस्सों को जाने दो।  वो जमाना दकियानूसी था।  अब तो बहुत से लोगों का प्यार परवान चढ़ता है , उनकी शादी होती है और बच्चे भी होते हैं। "

    आख्या के इस बखान पर अंकित ने  आज की जिंदगी की सच्चाई को खोलने का मन बना लिया। उसने सोच लिया कि आज के प्यार के तिलस्मी संसार से आख्या के किशोर मन से निकालने में उसे , उसकी मद्दत करनी चाहिए। वह टिक कर सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ गया।  उसने आख्या से कहा , " तुम भी मेरे सामने बैठो और मेरी बात को वैसे ही सुनो जैसे कोई दोस्त किसी दोस्त के साथ बैठकर किसी जटिल गुत्थी को समझना और उसका हल निकालना चाहता हो। "

आख्या ने वैसा ही किया। 

      " तुम्हें मीना  तो याद होगी न। "

      " वही , जो बी. टेक. में मुझसे एक साल सीनियर थी ?"         

        " हाँ , वही मीना राजपूत , जो सिंसियर भी थी और शायद पढ़े - लिखे  बड़े माँ - बाप की बेटी भी। "

        " उसका तो अफेयर था न , शैलेश गुलाटी के साथ !  मीना थोड़ी नकचढ़ी थी पर पढाई में बड़ी तेज थी।शैलेश भी किसी मायने में मीना से कम नहीं था।   कितना स्मार्ट लगता  था न ,पूरे कालेज में। उसकी तो प्लेसमेंट भी कालेज से ही हो गयी थी।  दोनों एक - दूसरे को दिल की गहराइयों से प्यार करते थे ,लगता था जैसे भगवान ने दोनों को जन्म - जन्मांतर से  एक - दूसरे  के लिए ही बनाया है। पूरे केम्पस में मशहूर थे दोनों के प्यार के किस्से , याद है मुझे। " 

       " हाँ , वही मीना राजपूत और उसका वो जन्म - जन्मांतर का साथी शैलेश गुलाटी ! " अंकित के कथन में व्यंग के साथ उपहास भरी हंसीं भी थी। "

        " उन दोनों ने तो शादी भी कर ली थी , तुम ऐसे क्यों बिलख रहे हो उनके प्यार को लेकर ? "

        " मुझे बिलखने की क्या जरुरत है , तुम्हें शायद पता नहीं कि  चॉकलेट  से शुरू होकर आइसक्रीम तक आते - आते इस तरह के प्यार का क्या हश्र होता है ? काश कि उनका प्यार चॉकलेट और  आइसक्रीम के तिलिस्म में ही उलझ कर रह जाता तो उनकी जिंदगी के बाकी साल जिंदगी की तल्ख और अँधेरी गलियों में भटकने से बच जाते। "

        " मन को परेशान करने वाली फिर वही नकारात्मक बातें। मेरी समझ में नहीं आता कि तुम्हें नौजवान उमंगों  में परवान चढ़ने वाले , इस सबसे प्यारे संवाद से इतना परहेज क्यों है।" आख्या लगभग सिहर उठी।    

        " ऐसा न कहो आख्या ! मैंने पहले भी कहा है कि प्यार हम सभी की जिंदगी का सबसे ऊर्जावान संवेग है।हमारे अंदर प्यार के हार्मोनस का रिसाव  न होता  तो हम जिंदगी को नकारने में जरा भी देर न लगाते। प्रेम तो  प्रकृति के हर जीव की मूलभूत आवश्यकता है। " अंकित अब थोड़ा सहज होते हुए बोला। 

        " ठीक है , पहेलियाँ बंद। अब बताओ क्या हुआ मीना राजपूत और शैलेश गुलाटी के प्यार का , जिहोने पूरे चार साल एक साथ एक - दूसरे को समझने के बाद शादी की और ? "  

         " और के आगे की कहानी यह है कि  उनकी सारी समझ , उनकी नासमझी में बदल गयी। उनके अपने - अपने अहंकार और मूर्खता की हद तक नासमझी के चलते उनके बीच का जन्म - जन्मांतर का प्यार अगले दो साल में ही तलाक की अँधेरी कोठरी के कूड़ेदान में बदल गया।  अब न कहीं चॉकलेट का स्वाद रहा और न ही कहीं आइसक्रीम की ठंडक। " अंकित के एक - एक शब्द में उदास बेबसी थी।  

    आख्या को यह सुनकर अच्छा नहीं लगा। वो भी अन्मयस्क हो गयी। प्यार कि संवेदना और सुरीलेपन को लेकर  उसका उत्साह ठंडा पड़ गया। उसने अपने अंदर एक उद्विग्नता भरी बेचैनी पसारने लगी। वह प्रश्न कर बैठी ," आखिर यह सब हुआ कैसे।  दोनों ने एक - दूसरे को समझाया क्यों नहीं ?"

        " समझते कैसे ? मीना पर अपनी माँ के आँचल का साया ढीला पड़ता , तभी तो वह पति और उसके परिवार , जो अब उसका अपना ही परिवार था के आँगन का परिंदा बनती। शैलेश दो बहनों के साथ  अपने माँ - बाप की सबसे बड़ी संतान था । उन  सभी ने मिलकर आपस में एक - दूसरे को बेहद प्यार करने वाला कोमलता से भरपूर मोहक वातावरण की रचना की थी । उन्होंने बड़े अपनत्व के साथ मीना राजपूत को भी अपने परिवार का हिस्सा माना था। दूसरी तरफ  मीना का अब तक का हर पल  अपनी माँ के दूध  से लिपटा था । उसकी माँ ने उसे घर - गृहस्थी की  जिम्मेदार सच्चाईओं का कोई ज्ञान नहीं दिया था। इसके अलावा  हर दिन के क्रियाकलापों में मीना के हर काम में मीना की अपनी बुद्धि कम , उसकी माँ की राय , आदेश बनकर शैलेश और मीना के बीच पसरने लगी ।  मीना , दिन पर दिन अपनी माँ के और करीब और शैलेश से दूर होती गयी। ये दूरियां इस कदर बढ़ीं कि उनके बीच का जन्म - जन्मांतर के वायदे वाला  पांच साल का प्यार किसी अंगार में बदल गया और उनके पास अलग होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। समझना मीना को था और वही नासमझ बन गयी। काश कि वह अपनी माँ पर भरोसा करने की जगह उस पर करती जिसके हाथों में उसने अपने जीवन की डोर को सौंपा था। " अंकित इससे आगे कुछ भी कहने में स्वयं को असमर्थ पा रहा था।

         आख्या भी कुछ नहीं बोल पायी।  दोनों के पास बोलने के लिए कुछ नहीं था। आख्या ने देखा , अंकित की आँखों में आंसूं थे । वह ज्यादा देर तक उस स्थिति में खुद को नहीं रख सकी  , " चलो छोड़ो उनके असफल प्यार को या फिर उनकी नासमझी को। सब लोग ऐसे नहीं होते।  तुम तो ऐसे रिएक्ट कर रहे हो जैसे ब्रेकअप उन दोनों का नहीं , तुम्हारा हुआ हो। भगवान ने अपनी दुनिया को रंग - बिरंगा ही नहीं बनाया , इसके बाशिंदों को भी तरह - तरह के मिजाजों से भर दिया है । दुनिया में बहुत से क्या अधिकतर जोड़े ऐसे हैं जो एक - दूसरे को समझते हुए , एक - दूसरे की उम्मीदों पर खरे उतरते हुए एक कामयाब वैवाहिक जीवन का आनंद ले रहे हैं।  पारिवारिक जिंदगी में  उन्हीं के भरोसे एक खुशनुमा संसार की रचना होती है। तुम्हें परेशांन  होने की जरुरत नहीं है। "

 अंकित के चेहरे से  गंभीरता की कोई लकीर गायब नहीं हुई। 

       " कहा न रिलेक्स हो जाओ ! तुम्हें क्या लेना - देना उन दोनों की जिंदगी से। जो जैसा करेगा ,  वैसा ही भरेगा भी।  " आख्या ने फिर से कहा।  

        "  ऐसा नहीं है आख्या ! अगर ऐसा ही  होता तो मीना और शैलेश में से गलत कौन था , इसका फैसला कैसे होगा। भरेंगें तो दोनों ही न ।" अंकित की इस चिंता से आख्या भी अंदर ही अंदर आहत हुई परन्तु उसने अपनी चिंता को जाहिर नहीं होने दिया। 

उसने कहा , " इसमें तुम क्या कर सकते हो , कुछ भी नहीं न। मेरा तो यही कहना है कि तुम्हें परेशान होने कि जरुरत नहीं है । "

       " वो तो ठीक है पर समझ में नहीं आता कि लोग समझते क्यों नहीं कि प्यार सिर्फ पाने का  नाम नहीं है , इसमें बहुत कुछ देना भी पड़ता है।"

        " अंकित ! तुम कुछ ज्यादा ही सेंटी हो रहे हो।  सब लोग ऐसे नहीं होते।हमारे देश में  अधिकतर शादियां कामयाब और खुशनुमा होती हैं। जैसे तुम्हारे या फिर मेरे भी मम्मी - पापा हैं। वे कितने सफल कपल हैं। "  

        " हाँ ! तुम यहाँ पर  ठीक हो आख्या।  पर मेरी चिंता की वजह बदले ज़माने का एक और जोड़ा भी है। " अंकित थोड़ा गंभीर था। 

        " वो कौन है और उन्होंने क्या किया ? " आख्या कुछ - कुछ खीझते हुए बोली। 

         " तुम शोभा आंटी और आशुतोष अंकल को तो जानती हो न? "

        " वही आशुतोष अंकल ,जिनको  पिछले साल हार्ट - अटेक आया था। "

        " हाँ वही  आशुतोष अंकल और उनकी धर्म पत्नी शोभा आंटी। "  

         " पर सुना है , अब तो वे ठीक हैं ।  अंकल की बीमारी के समय वे कितनी अपसेट थीं न। शुक्र है कि अंकल ने रिकवर कर लिया , नहीं तो आंटी को कुछ भी हो सकता था। वे भी  कितने सदमें में आ गयीं थीं !  पर इस घटना को हुए तो आज एक साल से ज्यादा गुजर चुका है , तुम उनका जिक्र क्यों कर रहे हो ? उन्हें अब क्या हुआ है ? " 

         " मैं उनका जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि उनकी शादी को पंद्रह साल से अधिक हो चुके थे , देखने - सुनने में उनके रिश्ते एक आम हिंदुस्तानी  पति - पत्नी की तरह सामान्य हैं  परन्तु उनके बीच एक अभेद्य दीवार भी बन चुकी है , जिसे गिराने का  कोई औजार शायद  किसी के भी पास नहीं है । " 

         " तुम यह सब कैसे कह सकते हो ? तुम्हें कैसे पता लगा कि उनके बीच कोई  अनबन है  और उस अनबन को सुलझाने का कोई रास्ता उनके पास या किसी के भी पास नहीं है ।" आख्या अब एक नयी कहानी जानने को उत्सुक हो उठी ।     

         " तीन साल पहले मैंने उनकी बेटी को पढ़ाया था। वैसे तो मेरा ट्यूशन टाइम शाम सात बजे का था परन्तु  एक दिन , किसी  काम से अचानक मैं उनके घर दोपहर में चला गया तो  घर के बाहर बिलकुल सन्नाटा था।  मैंने डोर पर हलकी सी थाप दी।  जब काफी देर तक मुझे कोई उत्तर नहीं मिला तो मैंने खिड़की में से झांक कर अंदर देखने  की कोशिश की।  मैं जानना चाहता था कि घर पर ताला  न होते हुए भी अंदर से कोई हलचल क्यों नहीं है ? खिड़की पर यूँ तो पर्दे थे परन्तु दुर्भाग्य से पर्दों के बीच की  दरारों में से मुझे अंदर का दृश्य दिखाई दे गया। उसे देखते ही मेरे पांवों के नीचे  की जमीन खिसक गयी। शोभा आंटी अपने बेड पर किन्हीं  अंकल के  साथ अपने वैवाहिक जीवन की सारी मर्यादा को कलंकित कर रहीं थीं। " 

    आख्या यह सुनकर सकते में आ गयी। वह अविश्वसनीय मुद्रा में अंकित को देखने लगी। उसे लगा , उसकी रक्तवाहिकाओं का सारा खून किसी जोंक ने चूस लिया है। वह अवाक् थी। अंकित बिना रुके बोला , " मैं बिना किसी प्रतिक्रिया के दबे पाँव  वापस आ गया। उस शाम में उनकी बेटी अंजली को पढ़ाने भी नहीं गया। मैंने तय कर लिया कि अब मैं वहां जाऊंगा ही नहीं। "

         " फिर तुम उनके घर कभी नहीं गए ! "

         " ऐसा  हो नहीं पाया, हो जाता तो अच्छा होता । क्योंकि  अगले दिन शोभा आंटी का फोन आया कि अंजली अपनी पढ़ाई मिस कर रही है और वह मेरा इन्तजार कर रही है। तब मुझे जाना पड़ा। " अंकित के चेहरे पर अवसाद के भाव जस के तस थे। 

          " आगे क्या हुआ , ये भी तो  बताओ। "   

           " मैं जब वहां पहुंचा तो ड्राइंग रूम खुला था। मैं अंदर चला गया।  शोभा आंटी के चेहरे के भाव बिलकुल नार्मल थे और वे सामने  सोफे पर बैठीं थी।  मैंने उनसे नजरे मिलाये बिना ही पूछा  , " आंटी , अंजली दिखाई नहीं दे रही ? "

           " शोभा आंटी शायद  मेरे प्रश्न के लिए तैयार थीं।  उन्होंने उलटे  प्रश्न उछाल दिया  ,मैं पहले पानी  लूंगा या सीधे चाय ? मैं बोला।  थैंक्यू आंटी।  आप अंजली को बुला दें तो मैं अपना काम करके जाऊं।  मुझे थोड़ी जल्दी  है आज। "

          " कोई बात नहीं , चले जाना। मुझे पता है अब तुम अंजली को हमेशा पढ़ने वाले नहीं हो। मैं जानती हूँ कल दोपहर जो कुछ तुमने देखा है , उसके बाद तुम यहाँ आना पसंद नहीं करोगे। " आंटी का चेहरा  ही नहीं ,उनके शब्द भी सपाट थे और उनके चेहरे पर  किसी प्रकार का ग्लानिभाव नहीं था। 

          " इसका मतलब , आपने मुझे जाते हुए देख लिया था ? " मैंने भी उसी लय में कहा। 

         " हाँ।  नहीं तो मैं तुम्हें फोन करके बुलाती ही क्यों। "

          " आंटी ! ये आपने क्या किया।  अंकल इतने अच्छे ,सच्चे और सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं , उनके साथ इतना बड़ा धोखा। पाप - पुण्य को जाने दीजिये। अंकल को या  कभी अंजली को इस बात का पता लग गया तो उन पर क्या बीतेगी ? ये जानती हैं आप ?   ये तो उनके प्रति आपके द्वारा किया गया  अपराध हुआ न आंटी ? " मैंने अपनी सारी शिकायतें एक साथ रख दीं। 

    आंटी बिना किसी उत्तेजना के स्थिर थीं।  उन्होंने उसी स्थिर दृष्टि से थोड़ी देर मेरी ओर देखा और फिर धीमें परन्तु विश्वास से भरे शब्दों में बोली , " देखो अंकित ! इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारे अंकल मुझ पर , अपनी ग्रहस्थी पर पूरा विश्वास करते हैं।  उन्हें पता है कि वे ही , नहीं मैं भी उनसे बहुत प्यार करती हूँ। मैं अपने किये का कोई स्पष्टीकरण देकर उसे जस्टिफाई  नहीं करूंगीं।  दुनिया की नजरों में , तुम्हारी नजरों में ये पाप है , पर क्या ये जरुरी है कि हम अपनी जिंदगी की जरूरतों को दूसरों की नजरों के नजरिये से तय करें। हमारे  अस्तित्व  पर क्या हमारा कोई हक़ नहीं है।ये ठीक है कि  तुम्हारे अंकल मेरी जिंदगी का अटूट हिस्सा  हैं , वे मुझे पसंद भी करते हैं और शायद मैं भी।  तभी तो हम इतने सालों से साथ हैं , परन्तु क्या यह स्वाभाविक नहीं है कि एक ही समय में दोनों में से  कोई भी किसी और को भी पसंद कर सकता है।  इतनी छूट तो हरेक को होनी ही चाहिए। " आंटी बिना किसी आवेश में आये हुए ,बिना किसी भय के,अपनी बात कह रहीं थी। उन्हें इस बात से कुछ भी मतलब नहीं था कि  मेरा मस्तिष्क या उसमें बैठे संस्कार उनकी बातों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

            " आंटी ! अगर आप इसे ठीक मानती हैं तो फिर घर में रहने वालों से छुपाने की क्या जरुरत है।  उनकी जानकारी में सबकुछ कीजिये। " मैं इतना ही कह पाया। 

         " अंकित ! मुझे यह पता है कि  हम जिस समाज और परिवेश  में रह रहे हैं , प्रत्यक्ष में उसकी मान्यताओं का पालन  जरुरी है , वरना वो  समाज हमें बहिष्कृत कर देगा। "

        " तो क्या हमें उसके नियमों का पालन नहीं करना चाहिए। "

         " नियम ,इसलिए होते हैं कि  व्यक्ति की जिंदगी आसान बने , न कि उसे किसी जेल में  बदल दे। एक साथ , एक परिवार में रहने का मतलब यह नहीं है कि हम कोई कैदी हैं और हमें एक सिमित दायरे में  सारी उम्र एक  कैदी की तरह ही काटनी है । " आंटी के पास अपने तर्क थे।  

         " पर आंटी आपने  सोचा कि अंकल को कभी पता चल गया तो उन पर क्या गुजरेगी ! " 

           "  अगर वो सचमुच  मुझसे प्यार करते होंगें तो मुझे म्रेरे इस रूप में भी  स्वीकार करेंगे। मैं भी तो उन्हें उनकी हर कमीं के साथ ही  अपनाती हूँ। "

          " और अंजली का क्या होगा ? उस पर क्या गुजरेगी  आंटी ? "

           " अंजली मेरी बेटी है और  अब इतनी मेच्योर हो चुकी है कि वो मुझे समझेगी और  किसी भी हाल में  मेरा साथ नहीं छोड़ेगी , यह मैं जानती हूँ। " 

         " मैं अब तक समझ चुका था की शोभा आंटी के पास अपने तर्क हैं और उनके सामने रखी गयी हर शंका बेमानी है। आज के समाज में  जिंदगी के  मान्य रिवाजों से अलग एक सच्चाई मेरे सामने थी , जिसे सुनकर मैं हतप्रभ तो जरूर था पर मानसिक स्तर पर एक हल्कापन भी महसूस कर रहा था।  मैं   समझ चुका था कि जिंदगी वो नहीं है जो हमने तय कर राखी है , जिंदगी वो है , जो यह जीती है। प्यार के संवेद भी इसी सूत्र से हल होते हैं। " अंकित का हर शब्द उसके अंदर बैठे किसी मनोवैज्ञानिक की  किताब के पन्ने से निकल रहे थे।

          " चलो , दार्शनिक जी ! अब तो  प्यार की किताब की सारी शंकाओं का समाधान मिल गया न।  अब जरा खुश भी हो जाइये। " आख्या बोली तो अंकित भी मुस्कुरा उठा।  

        " अब बताओ ! हवा को छुआ जा सकता है या नहीं ? "               

" हवा को महसूस किया जा सकता है , हवा हमारे बाहर ही नहीं , हमारे अंदर भी  रहती है। यहां तक कि पानी में भी अगर हवा न  घुली  होती तो जल में रहने वाला कोई भी जीव जीवित न रह पाता  और अगर जल में रहने वाले  जीव न होते तो हम भी न होते।  हमारी बेबसी ही सही कि हम हवा को  छू नहीं सकते पर वो है तभी तो हम भी हैं। "

" तब तो तुम मुझे हवा ही मान लो , तुम्हारे अंदर घुली हुई। "       

"  जिस पर मैं  जीवित हूँ , यही न। "

अब वे दोनों ही न कुछ कहना चाहते थे और न ही  कुछ सुनना। भविष्य के गर्भ में क्या है , दोनों के अंदर  प्रश्न का उत्तर , उनकी बेबसी बना हुआ था , जिसे समय पर छोड़ने के अलावा कोई हल नहीं था । 


सुरेंद्र कुमार अरोड़ा

साहिबाबाद ।