मंगलवार, 17 अगस्त 2021

आत्मनिरीक्षण (( लघुकथा संकलन )) **********



       "इन्दुमति श्री स्मृति लघुकथा विधा सम्मान योजना" के अन्तर्गत मैं अपनी पसंदीदा दो लघुकथाएं प्रस्तुत कर रही हूँ।

               एक मेरी स्वयं रचित मौलिक लघुकथा 'प्रतिदान' एवं एक आदरणीया चित्रा मुद्गल जी की लघुकथा 'गरीब की माँ ' है। 

                मेरी पसंदीदा लघुकथा प्रतिदान मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में से एक है। इस लघुकथा में मैंने प्रेम के स्वरूप को स्थापित करने की चेष्टा की है। केवल त्याग और बलिदान ही प्रेम को प्रकट करने के लिए पर्याप्त नहीं होते। 
                 पुरुष द्वारा परित्यक्ता आत्म सम्मान के साथ भी अपनी प्रेमाभिव्यक्ति को पुष्टता प्रदान कर सकती है। पुरुष द्वारा परित्यक्त होने के बाद उसका नाम लेकर जीवन भर विलाप करने की अपेक्षा अपने आत्मसम्मान के साथ जीवन का निर्वाहन भी प्रेम का एक स्वरूप हो सकता है। प्रेम हृदय की अभिव्यक्ति है। जिससे प्रेम किया उसके द्वारा प्रताड़ित होने पर भी हृदय से प्रेम का स्वरूप मिट नहीं सकता, कम नहीं हो सकता पर उसके लिए पुरुष के आह्वान पर उसके कदमों में बिछने की आवश्यकता नहीं है, वह उसके द्वारा उपकृत होने पर अधिक भी नहीं हो सकता नारी पुरुष की क्रीतदासी नहीं है जो उसके द्वारा जब मन चाहा छोड़ दी गई और जब मन चाहा ग्रहण कर ली गई। 
                  नारी के इसी आत्मसम्मान युक्त प्रेम का निर्वाहन करना ही इस लघुकथा का उद्देश्य है।
                नारी के सशक्त चरित्र का प्रस्तुतिकरण ही इस लघुकथा को मेरी प्रिय लघुकथा के रूप में प्रस्थापित करता है ।

                यह लघुकथा यश प्रकाशन द्वारा 'कलम की कसौटी' प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान पर विजेता रही है। फेसबुक के प्रायः सभी स्थापित लघुकथा समूहों में स्थान प्राप्त है। श्री अशोक जैन सर की लघुकथा पत्रिका 'दृष्टि' में भी प्रकाशित हुई है। 
          दिशा प्रकाशन द्वारा मेरे प्रकाशानाधीन लघुकथा संग्रह 'कितना कुछ अनकहा' में भी प्रकाशित हो रही है। 


लघुकथा 

प्रतिदान 

        "नहीं सिद्धार्थ... वहीं रुकिए... आपको मेरे कक्ष में प्रवेश की अनुमति नहीं है..। मैं वहीं आपके पास द्वार पर आ रही हूँ..। आपसे मिलने..।" 
         दासी ने संदेशद्वार पर खड़े सिद्धार्थ से जाकर कहा।
         "दीदी चाय...।" बाई ने आवाज दी।
         सिद्धार्थ यशोधरा की कहानी पढ़ती हुई रमा जैसे चौंक कर कपिलवस्तु से लौट आई हो।

            उसे स्कूल भी तो जाना है। अक्षय होस्टल में था और विकास को तो उसे छोड़कर गए एक अरसा बीत गया था। आज स्कूल से उसने छुट्टी ली हुई है। तभी तो सुबह - सुबह वह यशोधरा की कहानी पढ़ रही थी। कल विकास का फोन आया था। वह मिलने आने वाला था। सिद्धार्थ की तरह वह भी किसी अदृश्य की खोज में उसे और अक्षय को छोड़ कर चला ही तो गया था।

              "यशोधरा, मुझे तुम्हारे कक्ष में प्रवेश की अनुमति क्यों नहीं मिल सकती है?"
               "आप तथागत हैं, बुद्ध हैं। मेरा कक्ष मेरे प्यार का प्रतीक है,उस अक्षुण्ण प्यार का जो मैंने आपसे किया है। जिसे आप अपनी ज्ञान पिपासा में कभी समझ ही न सके। आप अपने ज्ञान में संतुष्ट रहें मैं अपने प्यार में खुश हूँ। आपने मुझे तब छोड़ा जब मुझे और राहुल को आपकी सबसे अधिक कामना थी।"
              "मांगों यशोधरा..। मैं तुम्हारे प्यार के बदले  में तुम्हें मोक्ष दिलवा सकता हूं । आओ आज मैं तुम्हें ज्ञान की दीक्षा देता हूं। आज मैं समर्थ हूं तुम्हारे प्यार का प्रतिदान देने के लिए।"
               "तथागत, आज मैं भी समर्थ हूं आपके ज्ञान के स्थान पर अपने प्रेम के साथ अपना जीवन व्यतीत करने में। आप कृपया अपने क्षेत्र में लौट जाएं मुझे अपने क्षेत्र में रहने के लिए स्वतंत्र करके। क्योंकि प्यार परतंत्रता में नहीं स्वतंत्र होकर ही किया जा सकता है। प्रतिदान की आकांक्षा वाला प्यार सच्चा प्यार नहीं हो सकता है।" और यशोधरा पुनः अपने कक्ष में लौट गई।
                   "बाई, जरा मेरा टिफिन लगा देना। मुझे स्कूल जाना है।"
"पर दीदी आपने तो आज छुट्टी ली हुई थी न..!"
                   "नहीं पगली, बेकार में कर्तव्य में नुकसान करना प्यार नहीं है न..!" 
                      बाई अचंभित सी रमा के चेहरे का दृढ़ निश्चय देख रसोई की तरफ चल दी ।

कनक हरलालका
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                अन्य विशिष्ट व वरिष्ठ लघुकारों की पसंदीदा लघुकथा की श्रेणी में मेरी दूसरी लघुकथा आदरणीय चित्रा मुद्गल जी की लघुकथा 'गरीब की माँ 'है ।

                  संवाद शैली में लिखी गई इस लघुकथा में चित्रा जी ने गरीब जीवन और उसमें व्याप्त समस्याओं के साथ - साथ उनके जीवन में नारी की दीन अवस्था व कद्र का वर्णन किया है। 
          शराब खोरी, घर भाड़ा, राशन सभी समस्याओं का समाधान माँ के स्वरूप में खोज लिया जाता है। जिसे जब चाहे जितनी बार एक, दो, तीन बार मार कर समस्या का समाधान खोज लिया जा सकता है। पिता के जीवन में माँ की इतनी ही आवश्यकता है कि उसकी मृत्यु के बाद पुनः दूसरी बार , तीसरी बार शादी कर उसकी पूर्ति कर ली जाती है ..।
         इस लघुकथा में चित्रा जी ने गरीब के जीवन की अनेक विसंगतियों को गरीबी, घर, राशन ,शराब खोरी, आलस्य,  बहानेबाजी आदि को प्रस्तुत किया है। प्रादेशिक भाषा के सहज संवादों के माध्यम से जीवन के वास्तविक रूप की प्रस्तुति इस लघुकथा को मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में एक बना देती है।

                यह लघुकथा मैंने मधुदीप गुप्ता जी द्वारा संपादित  'पड़ाव और पड़ताल' से उद्धृत की है। चित्रा जी के लघुकथा संग्रह में अवश्य ही प्रकाशित होगी। 


लघुकथा 

गरीब की माँ 


                "तेरे कू बोलने को नईं सकता?"
                "क्या बोलती मैं!"
                "साआआली...भेजा है मगज में?"
                "तेरे कू है न, तू काय को नईं बोलता सेठाणी से? भड़ुआ, अक्खा दिन पाव सेर मारकर घूमता अऊर..."
                "हलकट, भेजा मत घुमा। सेठाणी ने बोला क्या?"
                "ताबड़तोड़ खोली खाली करने कू बोलती।"
                "तू बोलने को नईं सकती होती, आता मेना में अक्खा हिसाब चुकता कर देंगा?"
                "वो मैं बोली।"
                "पिच्छू?"
                "बोलती होती मलप्पा को भेजना। खोली लिया, डिपासन भी नईं दिया। भाड़ा भी नईं देता। मैं रहम खाया पन अब्भी नईं चलने का।"
                "साअअला लोगन का पेट बड़ा, कइसा चलेगा! सब समझता मैं..."
                "तेरे कू कुछ ज्यादा चढ़ी, गुपचुप सो जा!"
                "सेठाणी दुपर को आई होती।"
                "क्या बोलती होती?"
                "वोईच, खोली खाली करने कू बोलती।"
                "मैं जो बोला था वो बोली क्या?"
                "मैं बोली, मलप्पा का माँ मर गया, मुलुक को पैसा भेजा, आता मेना मैं चुकता करेगा..."
                "पिच्छू?" 
                "बोली वो पक्का खड़ुस है। छे मेना पैला मलप्पा हमारा पाँव को गिरा- सेठाणी! मुलुक में हमारा माँ मर गया। मेरे को पन्नास रूपिया उधारी होना। आता मेना को अक्खा भाड़ा देगा, उधारी देगा। मैं दिया। अजुन तलक वो उधारी पन वापस नईं मिला।"
                 "पिच्छू,?"
                 "गाली बकने को लगी। खड़ूस शेण्डी लगाता...मेरे को? दो मेना पैला वो घर को आया, पाँव को हाथ लगाया, रोने को लगा। -- मुलुुक  मेंं माँ मर गया। आता मेना में शपथ, अक्खा भाड़ा चुकता करेगा, उधारी देगा। मैं बोली वो पहले माँ मरा था  वो कौन होती? तो बोला बाप ने दो सादी बनाया होता सेठाणी। नाटकबाजी अपने को नईं होना। कल सुबू तक पैसा नहीं मिला तो सामान खोली से बाहर..."
             "तू क्या बोली?"
             "डर लगा मेरे कू। बरसात का मेना किदर कू जाना ? मैं बोली सेठाणी मलप्पा झूठ नईं बोलता..."
             "पिच्छू..?"
             "पिच्छू बोली -- दो सादी बनाया तो तीसरा माँ किदर से आया?"
             "तू, तू क्या बोली?"
             "मैं बोली...  दो औरत मरने का पिच्छू सासरे ने तीसरा सादी बनाया!..."

चित्रा मुद्गल 

प्रस्तुतिकरण कनक हरलालका 

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 नमिता सचान सुंदर 

        इंदुमती श्री स्मृति लघुकथा विधा सम्मान योजना के अंतर्गत मेरी पसंदीदा लघुकथाएं। 

          अन्य लघुकथाकार की लघुकथा के रूप में साझा कर रही हूं, पृथ्वीराज अरोड़ा लिखित लघुकथा ‘कील’। 

        इस लघुकथा का रचना काल 1978 है। मैं पुरानी कथाओं में से अपनी पसंदीदा लघुकथा  इसलिए साझा कर रही हूं, जिससे हम उस समय के सृजन के विषय में भी जानते चलें, उन्हें याद रखें। 'कील' ने मुझे इसलिए प्रभावित किया कि बेहद साधारण सी बात के माध्यम से, चंद पंक्तियों में ही लेखक ने पूरे समाज की मानसिकता को बहुत स्पष्ट रूप में उकेर दिया है। कथा के विषय में अधिक लिख कर मैं पाठकीय आनंद को कम करने का दुःसाहस नहीं करूंगी। आप कथा पढ़िए और स्वंय निर्णय करिए।

        यह लघुकथा मैंने सचिन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘हिंदी लघुकथा कोश’ में पढ़ी थी। ‘हिंदी लघुकथा कोश’ के प्रथम संस्करण का प्रकाशन 1988 में हुआ था।

लघुकथा 

कील

पृथ्वीराज अरोड़ा

          सड़क के बीच एक कील पड़ी है।

          तेजी के साथ एक युवक साइकिल से आया। उसकी निगाह कील पर पड़ी। झटपट हैंडिल घुमा वह अपनी मुस्तैदी पर मुस्काया कि साइकिल का टायर पंचर होने से बचा लिया है।

          घिसे हुए जूते में कोई चीज चुभी है। बूढ़े ने गर्दन झुकाकर नीचे की ओर देखा। एक कील है।मुंह बिचकाकर  वह आगे निकल गया।

         फिर आगे- पीछे दौड़ते हुए दो लड़के आये। आगे वाले लड़के ने उछलकर अपने पांव को छलनी होने से बचा लिया है। 

          दूसरे ने पूछा, “उछले क्यों?”

       पहले वाले ने कील की ओर इशारा कर दिया। साथ ही जख्मी होने से बचने की खुशी में किलकारी भर दी। दूसरा भी उसकी होशियारी पर खुश हो गया।

          कील अब भी सड़क पर पड़ी है।

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         स्वरचित कथा के अंतर्गत प्रस्तुत है कथा ‘एक और कोशिश’। 

         यह कथा ‘मरू नव किरण’ पत्रिका के जनवरी- मार्च 21 के अंक में प्रकाशित हुई है। लघुकथा में मैंने यह कहने का प्रयास किया है कि जीवन में दो बातें हमें हमेशा ध्यान रखनी चाहिए। एक तो यह कि हमारा जीवन केवल हमें ही प्रभावित नहीं करता। हमारे किसी भी निर्णय से हमसे जुड़े जीवन भी प्रभावित होते हैं और उनके जीवन के प्रति अपने उत्तरदायित्व को हम नकार नहीं सकते। दूसरी बात यह कि कभी-कभी हम एक बार किसी भी स्थिति को जिस दृष्टिकोण से देखने लगते हैं, तो फिर दूसरी तरह से उस पर विचार ही नहीं करते और अक्सर अपनी धारणा के जाल में फंस गलत निर्णय ले लेते हैं। यह कथा हमें इसलिए प्रिय है क्यों कि एक पाठकीय प्रतिक्रिया के अनुसार इस कथा ने उन्हें अपनी समस्या पर फिर से विचार करने को प्रेरित किया और उसका परिणाम सुखद रहा। आप ही बताइए, रचना से हमारे लगाव के लिए यह कारण काफी नहीं है क्या? 

लघुकथा  

एक और कोशिश 

       “पापा, इतनी सर्दी में, बालकनी के अंधेरे में अकेले खड़े क्या कर रहे हैं आप?”

       “आती-जाती कारें, बाइक्स, स्कूटर गिन रहा हूं।

        “क्यों भला?”

        ‘’अरे गणित तेज होती है गिनती करते रहने से।‘’

       ‘’आप तो आई. आई. टी. टॉपर रहे हो, आपको जरूरत है गणित तेज करने की?”

       ‘’जिंदगी की गणित में तो फेल हो गए तुम्हारे पापा।" 

       “गणित का रिश्ता तो दिमाग से होता है न पापा और दादी कहती हैं जिंदगी दिमाग नहीं दिल से जीनी चाहिए।" 

        “अरे तुम्हारी दादी थी लिटरेचर की लेकचरार, हमें भी सब पाठ उल्टे ही पढ़ा दिए तभी तो फेल हो गये हम।" 

       “पर दादी तो नहीं फेल हुईं न?” 

       “हां, दादी तो तुम्हारी किसी मोर्चे पर फेल नहीं हुई”

        “तो फिर पापा... कहीं ऐसा तो नहीं कि आपने ही पाठ ठीक से नहीं पढ़ा?”

        चौंक कर रतन ने देखा अपनी इकलौती बारह वर्षीय बिटिया को। जरा देर की चुप में ही जैसे अपने भीतर बहुत दूर तक की यात्रा कर आया वह। मुस्कुरा कर बिटिया को प्यार से भींचा और बोला - “तो फिर चल, सवालों को नए तरीके से हल करने की एक और कोशिश करते हैं तेरे पापा।" 

        बिटिया की हल्की सी मुस्कान में पोर भर उम्मीद झिलमिला उठी। 


नमिता सचान सुंदर

 पता 5 /138 विकास नगर

लखनऊ -226022

मो.-- 7985281674