न्याय
एक कक्षा थी।
कक्षा में चालीस बच्चे थे।
बच्चे अलग अलग जातियों के तो थे ही, अलग अलग धर्मो के भी थे ।
इतना ही नहीं, अलग अलग वर्गों के भी थे, अर्थात गरीब भी और अमीर भी।
दुर्भाग्य से कुछ बेहद गरीब भी थे ।
कुछ पढ़ने मे पर्याप्त ध्यान देते थे तो कुछ का मन पढ़ाई की तरफ लगता ही नहीं था।
अध्यापक का काम सबको पढ़ाना था, वो अपना काम सबके लिये समान रूप से करता था।
पढ़ाई पर ध्यान न देने वाले बच्चे परीक्षा में फेल हो गये।
फेल होने वालों की संख्या पांच थी।
उनमें से एक गरीब, एक बहुत गरीब और तीन और थे जिनका धर्म और जाति अलग अलग थी।
फेल होना उन्हें मंजूर नहीं था। उन्होंने एक समूह बनाकर शिक्षक के विरूद्ध आन्दोलन खड़ा कर दिया। आन्दोलन विद्रोह मे बदल गया। समाज में अनेक लोगों को उनके उत्पीड़न की बू आने लगी।
समाज में न्याय के लिये लड़ने वाले लोग सक्रिय हो गये। समर्थन में अनेक संस्थाए भी जुट गयीं।
शिक्षक महोदय को उनकी गलती का एहसास करवाया गया और अन्ततः अध्यापक जी ने इस्तीफा दिया, पढ़ाई पर ध्यान न देने वाले बच्चे भी पास किये गये, तब जाकर न्यायिक प्रक्रिया पूर्ण मानी गयी।
ये क्रम अब भी बरकरार है।
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
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लघुकथा
दीया
बीते साल में लक्ष्मी की उस पर अतिरिक्त अनुकम्पा हुई थी। जमीन के एक ही सौदे ने उसकी जिंदगी का वर्षों का दरिद्र समाप्त कर दिया था। वर्षों बाद इस दिवाली उसके पास हर वो चीज थी, जिसकी चाहत उसने अपनी जिंदगी में की थी। इसीलिए उसने तय किया था कि यह दिवाली वो बड़ी धूम धाम से मनाएगा।
उसने अपने घर के हर कोने को रोशनी से नहला दिया था। सारे घर में रंग - बिरंगे बल्बों की चमचमाती चमक से हर तरफ चांदनी खिली हुई थी। रही सही कसर सुंदर दीपों ने पूरी कर दी थी। वह बल्बों की लड़ियों और कलात्मक दियों से सज्जित घर को आत्म मुग्ध होकर देख रहा था ।
नियत समय पर वह पूजा करने बैठा। उसके अंतर्मन का हर हिस्सा ने लक्ष्मी का धन्यवाद कर रहा था।
उसे लगा कोई उसके पास ठीक उसके सामने आकर बैठ गया है।
"तुमने मेरे सम्मान में क्या किया है?" उसके कानों में सनसनाहट हुई।
"मैने तुम्हारे स्वागत में इस घर को सजाया है, रंग - बिरंगे दीपों से रोशन किया है।" उसने कहा।
"क्या इस रोशनी में इसमें कहीं करुणा और दया की चमक है?"
"चमक तो आवेश से उत्पन्न होती है, दया या करुणा से तो सब कुछ शांत हो जाता है।"
"तो इसमें कहीं संतोष या सहयोग की बत्ती तो होगी ही?"
"उससे तो आगे बढ़ने की तमन्ना रुक जाती है, होड़ के बिना तरक्की कैसे होगी? तरक्की नहीं होगी तो आप भी नहीं होंगीं। "
"मुझे स्वीकृति का ईधन चाहिए, वो कहाँ है?" सनसनाहट अब भी बरक़रार थी।
"स्वीकार कर लूंगा तो सब लोग मुझे दोषी मान सजा के लिए तत्पर हो जायेंगें।" उसने संदेह प्रकट किया।
"मतलब न तुम्हें करुणा से सरोकार है, न दया से, न संतोष से, न सहयोग से, न स्वीकृति से और न ही कृतज्ञता से ही कोई लेना - देना है।"
"मेरी समझ में, मेरे इन दियों की बाती हमेशा जलती रहे इसके लिए होड़ जरूरी है। वो होगी तो मैं हर बार तुम्हें पाने में सफल रहूँगा।" उसने स्पष्ट किया।
वो अपनी बात पूरी करता कि इसी बीच बिजली गुम हो गई और सारी लड़ियां बुझ गईं। दियों का तेल भी चुक चुका था । सारे घर में अंधेरा छा गया।
वो छटपटाने लगा।
तब उसे एक आवाज सुनाई दी, रोशनी के लिए सहयोग का ईधन चाहिए, दया और करुणा की बाती चाहिए, होड़ नहीं कर्म और कृतज्ञता की मिट्टी चाहिए, तभी रोशनी हमेशा खिलती मिलेगी रहेगी और मेरे आगमन की निरंतरता भी बनी रहेगी।
उसने हाँ में सर हिलाया ही था कि बिजली वापस आ गयी। तब तक उसकी बेटी ने दीयों में तेल डाल दिये था और रोशनी पहले की तरह बिखर चुकी थी। अब वो सचमुच रोशनी में नहा रहा था।
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद
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लघुकथा
बच्चे की भूख
"क्रोध इंसान का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध में इंसान अपना मानसिक संतुलन खो देता है। क्रोध हमारे अंदर विवेक शून्यता की स्थिति उत्पन्न कर सही और गलत के बीच अंतर् को फर्क करने की क्षमता छीन लेता है। क्रोध कभी भी हमारी शक्ति नहीं बन सकता बल्कि यह हमारी शक्तिओं को नष्ट करने का कार्य करता है। " इतना कहते - कहते स्वामी जी ध्यानस्थ हो गए। उनके नेत्र बंद थे और चेहरे पर शांति की आभा के साथ ललाट पर तेज चमकने लगा ।
पंडाल में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को लगा उनके द्वारा अभी - अभी सुने गए शब्द स्वामी जी की जिह्वा से नहीं , किसी अदृश्य आकाशीय पिंड में विराजित किसी दिव्यात्मा के मुख से आये हैं। पूरे पंडाल में सन्नाटा पसर चुका था। पंडाल में उपस्थित हर श्रद्धालु स्वामी जी के आत्म - चिंतन की मुद्रा में स्वयं को समायोजित करने की चेष्टा करने लगा। पंडाल में सिर्फ चलते हुए पंखों की ध्वनि के अतिरिक्त और कोई आवाज नहीं थी। ऐसा लगा कि ईश्वर ने किसी ऐसे निर्वात की रचना कर दी है जिसमें समां जाने के बाद स्वर्ग के द्वार सामने ही मिलेंगें और जैसे ही स्वामी जी कि वाणी पुनः अवतरित होगी, द्वार खुलते देर नहीं लगेगी।
सभी स्वामी जी की वाणी की प्रतीक्षा पूरे मनोयोग से कर ही रहे थे कि तभी एक बच्चे के रुदन ने पंडाल के उस निर्वात को एक ही क्षण में भर दिया, "मम्मा! मुझे भूख लगी है, कुछ खाने को दो।"
ध्यान में खोयी पूरी सभा अपनी विचार तंद्रा में आये इस खलल को सह नहीं पायी और पंडाल में एक साथ कई स्वर उभरे , "भूखे बच्चे को यहाँ लाने की जरुरत क्या थी। लाना ही था तो इसे घर में दूध पिला कर लाते।"
इन स्वरों में कुछ स्वर कर्कश भी थे।
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा,
साहिबाबाद - 201005
( ऊ. प्र. ), मो : 9911127277
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लघुकथा
दोस्ती
--- तुम तो कह रहे थे कि वो तुम्हारा बहुत ही प्यारा और भोला दोस्त है और हमें उससे मिलने जरूर जाना है, जिससे दोस्ती में ताजगी बनी रहे।
--- अरे आज नहीं, फिर कभी।
---- तुमने तो कहा था कि वो जब भी मिलता है, कुछ ही पलों में अपने प्यार की सारी गागर उड़ेल कर रख देता है।
---- यार बात तो सच है पर उससे जो काम था, वो तो अब हो चुका है। अभी थोड़ा बिजी हूं, समय निकाल कर फिर कभी चलेंगे उससे मिलने।
कहकर उसने कार का एक्सीलेटर दबा दिया।
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद