सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की कहानियों को पढ़ते हुए
मुमताज तथा अन्य कहानियां : सजग समाज की संवेदनाजन्य कहानियां
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की छवि ख्याति प्राप्त लघुकथाकार की है. उन्होंने कहानियां भी लिखी हैं. हाल ही मैं दो पुस्तकें ‘सफर’ और ‘मुमताज तथा अन्य कहानियां’ प्रकाशित हुई हैं. ‘सफर’ में उनकी लघुकथाएं तथा दूसरी पुस्तक में उनकी कहानियां हैं.
पेशे से अध्यापक रहे सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा के लेखन में नैतिकतावादी दृष्टि प्रधान रहती है. उनका मानना है कि साहित्य को आदर्शोन्मुखी होना चाहिए. लेखक की रचना में उसकी कल्पना का समाज प्रतिबिंबित होना चाहिए. जाहिर है यह मानवतावादी संकल्पना है. जिसे प्रत्येक रचनाकर अपनी तरह से जीता है; और उसे अपनी कृति के माध्यम से साकार करने की कोशिश भी करता है. ‘सफर’ की कई लघुकथाएं पढ़ी हुई निकलीं. वैसे भी रचनाकार के करीबी होने का यह लाभ तो मिलता ही है. मित्रगण न केवल उसकी सद्यःरचित रचनाओं को जल्द पढ़ लेते हैं, बल्कि कई बार तो कल्पना में मौजूद रचना भी बातों-बातों में बाहर आ जाती है.
अरोड़ाजी आम जीवन से अपने पात्र उठाते हैं और समाज में जो श्रेयस्कर है या एक आदर्शोन्मुखी समाज के लिए जो अपेक्षित है, रचनाओं के माध्यम से वे उसी दिशा में आगे बढ़ जाते हैं. इस तरह उनकी रचनाएं पाठक के लिए मार्गदर्शक का काम भी करती हैं. हालांकि पिछले कुछ दशकों में साहित्य की जो परिभाषा गढ़ी गई है, उसमें साहित्यकार और साहित्य का उद्देश्य निर्माता का न होकर, महज यथास्थिति को पेश करने तक सिमट चुका है, जिसमें लेखक-साहित्यकार के पास बच निकलने की भरपूर संभावना रहती है. जाहिर है इसके मूल में बाजारवादी प्रेरणाओं का योगदान है.
प्रहारात्मकता को आमतौर पर लघुकथा का गुण माना जाता है. एक दौर था जब लघुकथाकारों में रचना को प्रहारात्मक बनाने की होड़ लगी रहती थी. इस कोशिश में रचना का अंत अनपेक्षित रूप से चौंकाऊ बन जाता था. इन दिनों उसके स्वरूप में बदलाव आया है. यह लघुकथा और मानवजीवन के बीच की कम हुई दूरी का संकेतक है. अरोड़ा जी चौंकाने में विश्वास नहीं रखते. उनकी रचनाएं जीवन की स्वाभाविक गति से आगे बढ़ती हैं और सलीके से समापन को प्राप्त होती हैं. मूल्य-प्रधान लेखन की यही विशेषता है. इसमें लेखक की दृष्टि प्रभावी रहती है, जिसपर कहीं न कहीं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रेरणाओं का भी असर रहता है.
हम यहां उनके कहानी लेखन ‘मुमताज तथा अन्य कहानियां’ को रेखांकित करना चाहेंगे. जिसकी रचनाएं अपने आप में उनके दक्ष कहानीकार होने का प्रमाण हैं. बल्कि जीवन और समाज का जो आदर्शवादी ढांचा उनकी परिकल्पना में है, वह कहानियों में ही सलीके से अभिव्यक्त हो पाता है.
‘मुमताज तथा अन्य कहानियां’ में उनकी 11 कहानियां शामिल हैं. एक बड़ी विशेषता जो पाठक पर प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती है, वह है इन कहानियों के नारीपात्र. जो कई जगह पुरुष पात्रों पर भारी पड़ते हैं.
अतीत में भारतीय समाज-व्यवस्था में जो गिरावट देखने को मिली, उसके अन्यान्य कारणों में एक कारण स्त्रियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाना भी था. समाज को यदि ऊपर उठाना है, यदि विकृतियों से मुक्ति प्राप्त करनी है तो उसके लिए स्त्री को पुरुष के समानांतर भूमिका में आना पड़ेगा. इन कहानियों में यह उद्देश्य साकार होता दिखाई पड़ता है. चाहे वह ‘मनुहार’ की मनु हो या ‘महक’ की नीलू. कथापात्र के रूप में हर स्त्री वैचारिक रूप से स्वतंत्र और समाज को दिशा देने वाली है. यह आत्मनिर्भरता और विश्वास उसे पुरुष की सौगात न होकर, खुद अर्जित की है.
विभाजन की त्रासदी के आसपास बुनी गई कहानी, ‘मुमताज’ की कथापात्र ‘मुमताज’ हालात की मारी जरूर है लेकिन कमजोर नहीं है. इसलिए जब फैसले की घड़ी आती है तो वह भरे आत्मविश्वास के साथ निर्णय लेकर पाठक को स्तब्ध कर जाती है. ‘आसक्ति या प्रेम’ भी संग्रह की दमदार कहानियों में से है. इस कहानी की खूबी यह है कि इसमें अतीत से वर्तमान और वर्तमान से अतीत की ओर आना-जाना लगा रहता है. मानव-मन की जटिलताओं को इस कहानी में बखूबी दर्शाया गया है. एकाध कहानी को जिसमें लेखकीय पूर्वाग्रह की झलक साफ नजर आती है, छोड़ दिया जाए तो इस पुस्तक की सराहना ही की जानी चाहिए. इससे अरोड़ा जी के कहानीकार का वह रूप नजर आता है जो उनके लघुकथा प्रेम के चलते कहीं दब-सा गया था.
हिंदी जगत पुस्तक का स्वागत करेगा, ऐसी उम्मीद है.
ओमप्रकाश कश्यप
मुमताज तथा अन्य कहानियां
पूनम प्रकाशन, 9/5123, गली नं. 1
पुराना सीलमपुर, दिल्ली.
संस्करण 2021
मूल्य सजिल्द 450
अजिल्द 350