सोमवार, 16 मई 2022

आधुनिक लघुकथाएं

आदरणीय मित्रों, 

सादर नमस्कार।

पंजाब से साहित्यकार सीमा वर्मा जी ने इंदुमति श्री स्मृति लघुकथा विधा सम्मान योजना के तहत दो  बहुत ही मार्मिक लघुकथाएं भेजी है। एक स्वयं की और दूसरी  लेखक श्री पवन जैन जी की। उम्मीद है आपको ये पसंद आएगी। 

प्रस्तुत लघुकथा के बारे में 

सीमा वर्मा जी कथन 

लघुकथा 'भुट्टे वाला' इसलिए पसंद है क्योंकि यह मेरी पहली रचना थी, जो हिन्दी और पंजाबी दोनों भाषाओं में मैंने लिखी थी। यह पहली बार 'फलक', 'लघुकथा के परिंदे' में और भी बहुत जगह मैंने पोस्ट की थी। उसके बाद 'इंग्लैंड के एक पेपर में छपी और फिर पंजाबी की पत्रिका 'मिन्नी' में छपी। यह मुझे इसलिए भी प्रिय है क्योंकि यह घटना मेरे साथ ही हुई, एक पढ़ा लिखा बेरोजगार सब्जियां बेचकर अपना गुजारा कर रहा था। उसे देखकर मेरे मन में उथल-पुथल मच गई। तब इस लघुकथा का जन्म हुआ।  

लघुकथा 

भुट्टे वाला 

"इनको मुंँह लगा लो तो यह सिर पर चढ़ जाते हैं!" 

"क्या हुआ आंटी जी?" मेरी पड़ोसन दरवाज़े के पास खड़ी कुछ बड़बड़ा रही थी। 

"कुछ नहीं यह भुट्टे वाला भईया।" 

"हाँ जी, मैं भी उसकी आवाज़ सुनकर आई थी, अरे वह तो चला गया!" मैं इधर उधर देखती हुई पूछ बैठी। 

"चला नहीं गया, भगा दिया मैंने!" 

"क्यों, कुछ हुआ क्या?" 

"बाज़ार में बीस रुपए किलो मिल जाते हैं भुट्टे, वह तीस रुपए लगा रहा था।" 

"चलो कोई बात नहीं, गरीब है बेचारा, घर बैठे ताज़ा सब्जियाँ भी दे जाता है।" 

"बाज़ार में सस्ती भी तो मिलती है!" कहती हुई वह घर के अंदर चली गई।" 

मैं वहीं खड़ी रही, मुझे पता था वह वापिस जरूर आएगा। महीने भर से यह अधेड़ हमारी गली में सब्जियाँ बेचने आ रहा था, मेरी पड़ोसन मोल भाव करके उसे परेशान कर देती। सब्जियाँ ताज़ा होती थी। मैं उसी से सब्जी और भुट्टे लेने लगी थी। 

इतनी देर में वह वापिस आ गया।

उसके आते ही मैंने पूछा, "क्या भाव लगाए भुट्टे?" 

"बीस रूपए किलो।" 

"आँटी को तीस रूपए क्यों कहा फिर?" मैंने भुट्टे चुनते हुए पूछा 

"लेती तो कुछ है नहीं बस मोल भाव करती है। आज 

मैंने भी उसे तीस रुपए कहकर टरका दिया।" 

मुझे हंँसी आ गई। मैंने भुट्टों के पैसे दिए और थैंक्स कह अंदर जाने को मुड़ी। 

"मैनशन नॉट मैडम जी आई कैन स्पीक इंग्लिश वैरी वैल, आई हैव डन एम ए इन इंग्लिश लिटरेचर।" 

मैं कभी उसको, तो कभी भुट्टों को देख रही थी। 



सीमा वर्मा 

लुधियाना (पंजाब) 

रचना काल 17/9/2017 

vermaseema969@gmail.com 

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आदरणीय पवन जैन जी की लघुकथा 'पशोपेश' मुझे बहुत पसंद है। क्योंकि हिंदी के शब्दों में यह पंजाबी भाषा में लिखी गई रचना है। यह लघुकथा बहुत ही भावपूर्ण, सशक्त और यथार्थ के धरातल पर बुनी गई बहुत ही बढ़िया रचना है। मैं इस लघुकथा का गुरुमुखी में भी अनुवाद कर चुकी हूंँ। यह आदरणीय के लघुकथा संग्रह 'फाउण्टेन पेन' में और पंजाब में छपने वाली मिनी पत्रिका में भी छप चुकी है। 

लघुकथा 

पशोपेश 

"कुड़माई हो गई तेरी?" 

धत् सुनने के लिऐ कान बेचैन थे, कि मुंँह पर एक ज़ोरदार मुक्का पडा़। 

"इन्ने सोणे सवाल दा ए जवाब ठीक नई।" 

"तां कि सेंडिल उतारां?" 

"न छटांक जई की जीभ चला दिओ।" 

"सामने सोबर, गबरू जवान को देख वह थोड़ा पिघली।" 

"अभी तो बी ई फाइनल में हूँ।" 

"मैं एम टेक कर चुका एक कंपनी में प्लेसमेंट भी हो गई।" 

"तो!" 

"तो क्या, तू कहे तो तेरे पियो नूं सुनेहा भिजवाऊं।" 

"चल कैपेचिनो में बैठ के गल्लां करदे आं।" 

" ओ वीरे ! चाअ बण गई, उठ जा" सुनकर सपना टूट गया। 

चाय पीते - पीते सामने दो साल बड़ी बेनूर होती बहन को देखकर वह सोच में डूब गया। 

पवन जैन 

जबलपुर