लघुकथा
प्रॉमिस
"नानू अब आप मेरे साथ खेलोगे। ठीक है?" बच्ची बोली।
नानू ने कोई उत्तर नहीं दिया।
बच्ची को लगा आज फिर नानू का मूड ठीक नहीं है। वे उदास है। वो सोच में पड़ गयी कि नानू का मूड कैसे ठीक हो। उसे याद आया नानू जब राम जी की कहानी सुनाते है। तब बड़े खुश होते है कि छोटे से राम जी ने अपने भाई के साथ मिलकर ताड़का जैसी खराब लेडी को अपने तीर से कैसे मार दिया था। उसने कहा, "नानू ! मैं आपसे राम जी की ताड़का से लड़ाई वाली कहानी भी सुनुंगी। सुना दीजिये न प्लीज।"
नानू फिर भी कुछ नहीं बोले।
बच्ची ने विषय बदला। वो जानती थी कि नानू अपनी किताबों को देख कर बड़े खुश होते है, और प्यार से उन्हें अलमारी में सजाते भी है। नानू की हर किताब पर नानू की फोटो भी होती है। उसने नानू से कहा, "नानू! अपनी किताब निकालिये न प्लीज! मैं उसकी एक कहानी सुनूंगी।"
नानू ने बच्ची की जिद पूरी करने की गरज से अनमने ढंग से अलमारी को खोला और एक किताब निकाल कर खोलने लगे।
बच्ची ने किताब को उनके हाथ से ले लिया और उस पर छपी नानू की तस्वीर को बड़े ध्यान से देखने लगीं। वे बेमन से बच्ची की हरकतों को देखते रहे। बच्ची अचानक बोल पड़ी, "नानू! इस फोटो में आप कितने अच्छे लग रहे हो क्योंकि इसमें आप हंस रहे हो! आप हमेशा ऐसे ही हँसते हुए ही अच्छे लगते हो। आप कभी भी गुस्सा मत किया करो।"
"ठीक है! अब राम जी की कहानी सुनाऊँ?" वे अब तक थोड़ा सामान्य हो चुके थे।
"गुस्सा नहीं करोगे! प्रॉमिस।"
"यस बेटा! प्रॉमिस।" वे मुस्कुरा दिए। बच्ची भी हंस दी।
उन्हें लगा 'जिंदगी जीने के लिए' कुछ और साल मिल गए।
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
साहिबाबाद
