लघुकथा को शब्द संख्या में बांधना कोई अचंभा /अजूबा नहीं है। यह एक सामान्य प्रक्रिया ही है।
शब्द सीमा सभी जगह पर है। शब्द सीमा की रेखा कहां खींची जाएगी? कौन खींचेगा? क्या यह सर्वमान्य होगी ? सवाल यह है। लघुकथा की शब्द संख्या विवादित हो रही है । यह लघुकथा विधा के लिए हानिकारक ही है । शब्द संख्या कोई 250 से 350 बता रहा है । कोई 750 से अधिक या कोई 1200 , 1400 से अधिक।
कहानी के बाद छोटी कहानी /कथा के बाद लघु कथा /उपन्यास के बाद लघु उपन्यास यह शब्द मूल रूप से शब्द संख्या के कारण ही आए हैं।
यदि शब्दों की संख्या लेखक को तय करना है तो बहस बेमानी हुई।
देश काल के अनुसार सीमा रेखाएं बदलती है। सर्वगुण संपन्न रचना को शब्द संख्या में छुट देना पड़ेगी, दी जाएगी। यह रचना अपवाद स्वरूप सर्वमान्य होगी।
उदय श्री ताम्हणे
